बॉलीवुड और टीवी इंडस्ट्री में आमदनी 50% गिरी? ‘thetopindia’ सर्वे का बड़ा दावा और पर्दे के पीछे का सच

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बॉलीवुड और टीवी इंडस्ट्री में आमदनी 50% गिरी? 'thetopindia' सर्वे का बड़ा दावा और पर्दे के पीछे का सच

बॉलीवुड और टीवी इंडस्ट्री में आमदनी 50% गिरी? 'thetopindia' सर्वे का बड़ा दावा और पर्दे के पीछे का सच

जब हम बॉलीवुड या एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में चमचमाते सितारे, बड़ी गाड़ियाँ, रेड कार्पेट और एक शानदार लाइफस्टाइल का खयाल आता है। लेकिन कैमरे के पीछे काम करने वाले उन हजारों लोगों की जिंदगी ऐसी बिल्कुल नहीं होती। हाल ही में एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। सोशल मीडिया और गूगल ट्रेंड्स पर आजकल “thetopindia survey” नाम का एक कीवर्ड तेजी से वायरल हो रहा है। इस सर्वे ने दावा किया है कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में पर्दे के पीछे काम करने वाले हजारों वर्कर्स की कमाई आधी रह गई है। आइए इस न्यूज़ आर्टिकल में विस्तार से समझते हैं कि आखिर इस दावे में कितनी सच्चाई है और फिल्म इंडस्ट्री की जमीनी हकीकत क्या है।


1. चमकती दुनिया का अंधेरा सच: क्या है ‘thetopindia’ सर्वे का दावा?

वेबसाइट ‘thetopindia’ ने अपने एक हालिया सर्वे के हवाले से एक बड़ा दावा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में (जिसमें बॉलीवुड, टीवी और डिजिटल कंटेंट शामिल है) पर्दे के पीछे काम करने वाले हजारों टेक्नीशियंस, क्रू मेंबर्स और वर्कर्स की आमदनी पिछले कुछ महीनों में 50 से 60 प्रतिशत तक घट गई है।

इस वेबसाइट का कहना है कि यह सर्वे 1,000 से ज्यादा ऐसे लोगों से बातचीत और इंटरव्यू पर आधारित है जो दिन-रात इस इंडस्ट्री को चलाने का काम करते हैं। इस दावे के मुताबिक, लोगों को अब नियमित रूप से काम नहीं मिल रहा है, और अगर काम मिल भी रहा है, तो उसके लिए उन्हें पहले के मुकाबले बहुत कम पैसे दिए जा रहे हैं।


2. किन लोगों पर पड़ा है सबसे ज्यादा असर?

कोई भी फिल्म या टीवी शो सिर्फ बड़े एक्टर्स से नहीं बनता। इसके पीछे एक पूरी फौज होती है। इस वेतन संकट (Pay Crisis) का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा है जो दिहाड़ी (Daily wage) या प्रोजेक्ट के आधार पर काम करते हैं। सर्वे में बताया गया है कि निम्नलिखित वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब है:

  • असिस्टेंट डायरेक्टर्स (ADs)
  • लाइटमैन और कैमरा ऑपरेटर्स
  • मेकअप आर्टिस्ट्स और हेयर स्टाइलिस्ट्स
  • स्पॉट बॉयज़ और प्रोडक्शन क्रू
  • छोटे कैरेक्टर आर्टिस्ट्स और जूनियर आर्टिस्ट्स

ये वो लोग हैं जो शूट शुरू होने से पहले सेट पर आते हैं और पैक-अप के बाद सबसे आखिर में जाते हैं। नियमित आमदनी न होने की वजह से इनकी जिंदगी में एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।


3. मुंबई जैसे शहर में गुज़ारा करना हुआ मुश्किल

मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है, लेकिन यहां रहने का खर्च (Cost of living) किसी से छुपा नहीं है। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का पूरा काम अंधेरी, जुहू, बांद्रा, गोरेगांव और मलाड जैसे इलाकों के आस-पास होता है। रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि इन इलाकों में एक आम से फ्लैट का किराया भी लगभग 50,000 रुपये महीना होता है।

एक फ्रीलांसर जो एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर अपनी आमदनी के लिए निर्भर करता है, उसके लिए बिना नियमित काम के इतना भारी किराया देना और अपने परिवार का पालन-पोषण करना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है।


4. क्या सच में मंदी के दौर से गुज़र रही है एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री?

अब आते हैं उन तथ्यों (Facts) पर जिनकी आधिकारिक तौर पर पुष्टि हो चुकी है। अगर हम ‘thetopindia’ के दावे को एक पल के लिए किनारे भी रख दें, तो भी विश्वसनीय डेटा यह साबित करता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री सच में एक कठिन दौर से गुज़र रही है।

नीचे दी गई तालिका (Table) फिल्मों के निर्माण में आई गिरावट को स्पष्ट रूप से दर्शाती है:

वर्षरिलीज़ हुई फिल्मों की संख्या (थिएटर + स्ट्रीमिंग)इंडस्ट्री की स्थिति
2023218सामान्य / सुधार की ओर
2024137भारी गिरावट / मंदी

फिल्मों का कम बनना सीधे तौर पर इस बात का इशारा है कि टेक्नीशियंस और क्रू के लिए मार्केट में काम कम हो गया है। ‘ओरमैक्स मीडिया’ (Ormax Media) के आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। उनके मुताबिक, 2019 में सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखने वालों की संख्या 1.03 अरब थी, जो 2025 में गिरकर 83.2 करोड़ रह गई है। बॉक्स ऑफिस पर लगातार फ्लॉप हो रही फिल्मों ने प्रोड्यूसर्स को निवेश करने से डरा दिया है।


5. OTT प्लेटफॉर्म्स पर भी छाई मंदी

कोविड-19 के बाद OTT (ओवर-द-टॉप) प्लेटफॉर्म्स ने एक बड़ा बूम देखा था, और लगा था कि यह इंडस्ट्री को बचा लेगा। लेकिन अब OTT का बुलबुला भी शांत होता नज़र आ रहा है।

  • बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने अपने बजट में भारी कटौती की है।
  • ओरिजिनल कंटेंट कम प्रोड्यूस करना शुरू कर दिया गया है।
  • एक बड़ी स्ट्रीमिंग कंपनी ने जहां 2023 में 10 ओरिजिनल शोज़ बनाए थे, वहीं 2024 में उन्होंने सिर्फ 5 प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई।
  • हॉटस्टार (Hotstar) जैसे प्लेटफॉर्म ने अपने टाइटल्स की संख्या 17 से घटाकर सिर्फ 11 कर दी है।

जब नए शोज़ ही नहीं बनेंगे, तो लोगों को काम कहाँ से मिलेगा?


6. स्टार्स को पूरा पैसा, क्रू मेंबर्स को इंतज़ार

इस पूरी पे-क्राइसिस (Pay Crisis) के बीच एक और कड़वा सच सामने आया है। ‘द प्रिंट’ (ThePrint) की एक ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, इंडस्ट्री में वित्तीय भेदभाव साफ देखा जा सकता है।

किसी भी प्रोजेक्ट का ज्यादातर बजट सिर्फ ए-लिस्ट स्टार्स (A-list stars) और उनकी बड़ी-बड़ी टीमों (जैसे पर्सनल मैनेजर, जिम ट्रेनर, शेफ) पर खर्च हो जाता है। उन्हें उनकी पेमेंट समय पर मिलती है, लेकिन जब प्रोडक्शन का बजट पार होने लगता है, तो सबसे पहले छोटे क्रू मेंबर्स, लाइटमैन और मेकअप आर्टिस्ट्स की पेमेंट रोक दी जाती है। ‘द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया’ की 2025 की एक रिपोर्ट भी इस बात पर मुहर लगाती है कि बड़े स्टार्स और डायरेक्टर्स को छोड़कर, लगभग पूरी इंडस्ट्री वेतन कटौती (Pay-cuts) का सामना कर रही है।


7. साउथ इंडस्ट्री और टीवी की तरफ बढ़ते कदम

जब बॉलीवुड में काम और पैसा दोनों की कमी होने लगी, तो लोग मजबूर होकर दूसरे रास्ते तलाशने लगे हैं।

  • टेलीविज़न इंडस्ट्री: बहुत से टेक्नीशियन मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर टीवी इंडस्ट्री की तरफ वापस जा रहे हैं, जहां कमाई थोड़ी कम है लेकिन काम हर रोज़ मिलता है।
  • साउथ इंडियन सिनेमा: एक बड़ा हिस्सा साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री, खासकर तेलुगु और तमिल सिनेमा (टॉलीवुड और कॉलीवुड) की तरफ शिफ्ट हो रहा है। वहां अभी भी बड़े पैमाने पर फिल्में बन रही हैं और पेमेंट का सिस्टम ज्यादा अनुशासित (Disciplined) माना जाता है।

8. कितना सच है यह सर्वे? एक फैक्ट चेक

हालांकि इंडस्ट्री में चल रही परेशानियां बिल्कुल सच हैं, लेकिन ‘thetopindia’ सर्वे पर पूरी तरह से आंख मूंदकर भरोसा करना ठीक नहीं होगा। एक जागरूक पाठक के रूप में हमें कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  1. पद्धति (Methodology) का अभाव: इस रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि इस सर्वे का डेटा कैसे और किन लोगों से इकट्ठा किया गया।
  2. आधिकारिक पुष्टि नहीं: FWICE (फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज) जैसी किसी भी बड़ी और मान्यता प्राप्त इंडस्ट्री यूनियन ने 50-60% की गिरावट वाले इस विशिष्ट दावे को वेरिफाई नहीं किया है।
  3. क्रेडिबिलिटी: एक ही दावे के लगभग समान वर्ज़न वेबसाइट पर बार-बार रिपीट किए गए हैं, जो इसकी विश्वसनीयता (Credibility) पर थोड़ा सवाल उठाते हैं।
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