नीट विरोध प्रदर्शन: जंतर-मंतर के बाद अब डिजिटल मोर्चे पर जंग, दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर शुरू किया बड़ा क्रैकडाउन
नीट विरोध प्रदर्शन: जंतर-मंतर के बाद अब डिजिटल मोर्चे पर जंग, दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर शुरू किया बड़ा क्रैकडाउन
NEET-UG परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक को लेकर शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब केवल दिल्ली की सड़कों और जंतर-मंतर के बैरिकेड्स तक सीमित नहीं रह गया है। 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हुई हिंसक झड़पों और कथित पुलिसिया कार्रवाई के बाद अब यह लड़ाई डिजिटल मोर्चे पर आ गई है। दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ एक व्यापक और कड़ा क्रैकडाउन शुरू कर दिया है। पुलिस प्रशासन ने विभिन्न सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दिए हैं कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के खिलाफ अभद्र, आपत्तिजनक या भड़काऊ भाषा वाले पोस्ट, वीडियो और कमेंट्स को तुरंत हटाएं।
यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार नीट-यूजी विवाद से पैदा हुए जनाक्रोश और राजनीतिक संकट से निपटने के लिए अब डिजिटल स्पेस पर भी सख्त निगरानी रख रही है। जो आंदोलन शिक्षा प्रणाली में सुधार और तत्कालीन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुआ था, वह अब अभिव्यक्ति की आजादी, विरोध प्रदर्शन के अधिकार और डिजिटल सेंसरशिप के एक बड़े संवैधानिक सवाल में बदल चुका है।
डिजिटल निगरानी और पुलिस का रुख
सोमवार, 27 जुलाई 2026 को दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने पुष्टि की कि उनकी विशेष सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल 24 घंटे सक्रिय रूप से काम कर रही है। यह सेल एक्स (पूर्व में ट्विटर), इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स की लगातार स्कैनिंग कर रही है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस अभियान का मुख्य उद्देश्य उन पोस्ट्स को चिन्हित करना है जिनमें प्रधानमंत्री, सरकार या सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ “गाली-गलौज”, “अशोभनीय टिप्पणियां” या ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है जो सार्वजनिक शांति और कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती है। जैसे ही ऐसी सामग्री पाई जाती है, पुलिस संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों को कानूनी नोटिस भेजकर उस सामग्री को हटाने (take-down notice) का दबाव बनाती है। इस प्रक्रिया के तहत कई वीडियो और पोस्ट पहले ही इंटरनेट से हटाए जा चुके हैं।
दिल्ली पुलिस अपने इस कदम को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की मजबूरी बता रही है। पुलिस आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई को हुए उपद्रव में कम से कम 130 पुलिसकर्मी और करीब 65 छात्र घायल हुए थे, जिसके बाद 15 प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थीं। पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर हजारों की संख्या में छात्र जमा थे, और ऐसे में सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही भड़काऊ सामग्री से हिंसा दोबारा भड़क सकती थी।
इसके अलावा, पुलिस ने उन्नत तकनीकों के इस्तेमाल का भी बचाव किया है। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन स्थलों पर ‘फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम’ (FRS) कैमरों की मदद से 2,000 से अधिक ऐसे असामाजिक तत्वों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान की गई है जो छात्रों के आंदोलन में घुसपैठ कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे।
छात्रों और नागरिक समाज का आरोप: ‘सबूत मिटाने की साजिश’
पुलिस भले ही इस क्रैकडाउन को शांति बनाए रखने की कवायद बता रही हो, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्र और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इसे एक अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका आरोप है कि यह क्रैकडाउन भड़काऊ भाषा को रोकने के लिए नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के वीडियो और सबूतों को इंटरनेट से मिटाने के लिए किया जा रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए 20 जुलाई के मार्च के बाद, सोशल मीडिया पर ऐसे दर्जनों वीडियो वायरल हुए थे जो पुलिस के आधिकारिक दावों पर सवाल खड़े करते थे। कई वीडियो में सादे कपड़ों में और वर्दीधारी पुलिसकर्मियों को लाठियां चलाते, वाहनों में तोड़फोड़ करते और निहत्थे छात्रों पर पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) का कथित इस्तेमाल करते देखा गया।
विशेष रूप से, महिला छात्रों के साथ हुई बदसलूकी और एक पत्रकार सहित कई छात्रों के गंभीर रूप से घायल होने के वीडियो ने देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि मुख्यधारा के मीडिया में पर्याप्त जगह न मिलने के कारण सोशल मीडिया ही उनकी आवाज और सच्चाई को देश के सामने लाने का एकमात्र माध्यम था। ऐसे में डिजिटल सामग्री को हटवाना पीड़ितों की आवाज को दबाने और पुलिसकर्मियों को कानूनी कार्रवाई से बचाने की एक सोची-समझी रणनीति है।
संसद से सुप्रीम कोर्ट तक राजनीतिक और कानूनी संग्राम
सड़कों पर पुलिस की कार्रवाई और इंटरनेट पर सेंसरशिप के इस दोहरे हमले ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा हथियार दे दिया है। सोमवार को जब संसद के मानसून सत्र की कार्यवाही शुरू हुई, तो ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के नेताओं ने दोनों सदनों में जोरदार हंगामा किया। विपक्ष ने दिल्ली पुलिस द्वारा बल प्रयोग और ऑनलाइन सेंसरशिप के मुद्दे पर तत्काल स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) लाकर चर्चा कराने की मांग की।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए तानाशाही रवैया अपना रही है और छात्रों की जायज मांगों को दबाने के लिए आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर रही है।
वहीं, यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर भी पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने जंतर-मंतर पर हुई पुलिस बर्बरता और मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है। मंगलवार, 28 जुलाई को होने वाली यह सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां सुप्रीम कोर्ट को एक तरफ राज्य की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ नागरिकों के मौलिक अधिकारों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन तय करना होगा।
लोकतंत्र और डिजिटल अधिकारों के लिए एक नज़ीर
दिल्ली में बन रहे हालात इस बात का एक गंभीर उदाहरण हैं कि आधुनिक युग में विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप कैसे बदल गया है। आज की सरकारें केवल सड़कों पर उमड़ने वाली भीड़ से नहीं निपट रहीं, बल्कि स्क्रीन पर तैरते विचारों और वीडियो से भी लड़ रही हैं।
यद्यपि किसी भी सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन जब सरकार की आलोचना और “आपत्तिजनक सामग्री” के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है, तो डिजिटल क्रैकडाउन लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक मिसाल बन जाता है। नीट आंदोलन अब केवल एक प्रवेश परीक्षा में हुई धांधली का मामला नहीं रह गया है; यह भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिस सुधारों और डिजिटल युग में नागरिक अधिकारों की रक्षा की एक कठिन परीक्षा बन चुका है।
