UPI शुल्क विवाद: क्या पी. चिदंबरम सहित 5 कांग्रेस सांसदों ने किया था समर्थन?

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UPI शुल्क विवाद: क्या पी. चिदंबरम सहित 5 कांग्रेस सांसदों ने किया था समर्थन?

UPI शुल्क विवाद: क्या पी. चिदंबरम सहित 5 कांग्रेस सांसदों ने किया था समर्थन?

भारत में डिजिटल भुगतान को लेकर एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार द्वारा ₹2,000 से अधिक के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) मर्चेंट (व्यापारी) लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने के फैसले ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है। एक तरफ जहां लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस कदम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार पर तीखा हमला कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कांग्रेस पर ही पलटवार किया है।

सरकारी सूत्रों और भाजपा का दावा है कि जिस नीति का राहुल गांधी विरोध कर रहे हैं, उसका समर्थन खुद उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने किया था। रिपोर्टों के अनुसार, संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Finance) ने इस शुल्क की सिफारिश की थी, और मजे की बात यह है कि इस समिति में पी. चिदंबरम सहित कांग्रेस के पांच सांसद शामिल थे, जिन्होंने इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी।

क्या है नया UPI शुल्क नियम? मंगलवार को भारत सरकार ने घोषणा की कि 15 अक्टूबर, 2026 से ₹2,000 से अधिक के UPI मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का शुल्क (MDR – Merchant Discount Rate) लगाया जाएगा।

इस घोषणा ने आम जनता और छोटे व्यापारियों के बीच भ्रम और चिंता पैदा कर दी। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह शुल्क केवल बड़े मर्चेंट लेनदेन (Person-to-Merchant या P2M) पर लागू होगा। आम लोगों के बीच पैसे भेजने (Person-to-Person या P2P) और ₹2,000 से कम के किसी भी मर्चेंट भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। यह कदम UPI इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

राहुल गांधी का सरकार पर हमला इस फैसले के आते ही राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा राजनीतिक प्रहार किया। उन्होंने इस नए नियम को ‘UPI टैक्स’ करार दिया और आरोप लगाया कि यह फैसला विदेशी दबाव में लिया गया है।

गांधी ने अपने बयानों में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने “घुटने टेक” दिए हैं और अमेरिका को भारी रकम पहुंचाने के लिए यह कदम उठाया है। उनका तर्क था कि इस फैसले से विदेशी फिनटेक कंपनियों को फायदा होगा और भारत के छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ पड़ेगा। राहुल गांधी ने सरकार से इस फैसले को तुरंत वापस लेने (Rollback) की मांग की है।

सरकार का पलटवार: “खुद आपके सांसदों ने दी थी मंजूरी” राहुल गांधी के हमलों का जवाब देते हुए सरकारी सूत्रों और भाजपा नेताओं ने संसदीय समिति की एक रिपोर्ट का हवाला दिया। भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अगस्त में अपनी एक रिपोर्ट अपनाई थी, जिसमें UPI लेनदेन के लिए एक स्तरीय (tiered) MDR और राजस्व ढांचे की सिफारिश की गई थी।

सरकारी अधिकारियों ने बताया कि जिस दिन (12 अगस्त) यह रिपोर्ट अपनाई गई, उस दिन समिति की बैठक में कांग्रेस के पांच सांसद मौजूद थे:

  1. पी. चिदंबरम (पूर्व वित्त मंत्री)
  2. मनीष तिवारी (पूर्व केंद्रीय मंत्री)
  3. गौरव गोगोई
  4. किशोरी लाल
  5. के. गोपीनाथ

सरकारी सूत्रों का कहना है कि इन पांचों कांग्रेस सांसदों में से किसी ने भी इस रिपोर्ट या UPI पर शुल्क लगाने के प्रस्ताव पर कोई असहमति (Dissent) दर्ज नहीं कराई। एक वरिष्ठ सरकारी पदाधिकारी ने सवाल उठाया, “राहुल गांधी उस चीज का विरोध क्यों कर रहे हैं जिसका समर्थन खुद उनकी पार्टी के सांसदों, जिनमें पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम शामिल हैं, ने संसदीय पैनल में किया था?”

संसदीय समिति ने शुल्क की सिफारिश क्यों की? संसदीय समिति की रिपोर्ट में भारत के डिजिटल भुगतान ढांचे की वित्तीय वास्तविकता को सामने रखा गया है। समिति ने इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि UPI इकोसिस्टम को चलाने की लागत बहुत अधिक है, और बिना राजस्व मॉडल के यह लंबे समय तक नहीं चल सकता।

रिपोर्ट में बताया गया है कि UPI से हर महीने लगभग 150 बिलियन लेनदेन होने की उम्मीद है और 600 मिलियन नए उपयोगकर्ता जुड़ने वाले हैं। हालांकि, वर्तमान में सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि (Subsidy) उद्योग की वास्तविक लागत का केवल 11 प्रतिशत ही कवर करती है। उद्योग की अनुमानित परिचालन लागत ₹20,700 करोड़ है, जबकि सरकारी आवंटन मात्र ₹2,000 करोड़ है। इस भारी अंतर (Structural Funding Gap) के कारण साइबर सुरक्षा, नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर और धोखाधड़ी की रोकथाम में निवेश प्रभावित हो रहा है। इसलिए, समिति ने सरकार के खजाने पर लगातार बोझ डाले बिना UPI इकोसिस्टम को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक ‘टियर रेवेन्यू मॉडल’ (Tiered Revenue Model) लागू करने की सिफारिश की थी।

विदेशी दबाव के दावों का खंडन वित्त मंत्रालय ने राहुल गांधी के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि यह फैसला विदेशी प्रभाव या अमेरिकी दबाव में लिया गया है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया, “कुछ दावों से पता चलता है कि यह बदलाव विदेशी प्रभाव के कारण है। यह पूरी तरह से गलत है। भारत के UPI नीतिगत फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं, जिसका स्पष्ट लक्ष्य एक आत्मनिर्भर, समावेशी और किफायती डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम बनाना है।”

निष्कर्ष UPI पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का मुद्दा अब एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन गया है। राहुल गांधी इसे आम जनता और व्यापारियों पर हमला बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे डिजिटल इंडिया के बुनियादी ढांचे को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए एक आवश्यक आर्थिक कदम बता रही है। संसदीय पैनल में कांग्रेस नेताओं की मौन सहमति ने इस बहस को और भी दिलचस्प बना दिया है। जैसे-जैसे 15 अक्टूबर की तारीख करीब आएगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस फैसले पर कायम रहती है या राजनीतिक दबाव में कोई बदलाव करती है

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