अमेरिका-ईरान वार्ता: युद्ध के मुहाने से लौटी दुनिया, ट्रम्प ने कहा- सोमवार से शुरू होगी कूटनीतिक बातचीत
अमेरिका-ईरान वार्ता: युद्ध के मुहाने से लौटी दुनिया, ट्रम्प ने कहा- सोमवार से शुरू होगी कूटनीतिक बातचीत
दुनिया एक बार फिर से एक भयंकर विनाशकारी युद्ध के कगार पर खड़ी थी, लेकिन अंतिम क्षणों में कूटनीति ने एक बार फिर से अपना असर दिखाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस बात की पुष्टि की है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच सोमवार से सीधी कूटनीतिक बातचीत फिर से शुरू होने जा रही है। इस ऐतिहासिक और अहम घटनाक्रम से पहले मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया था। ट्रम्प प्रशासन ने तेहरान के खिलाफ बड़े सैन्य हमलों की योजना को रोक दिया है, जो दुनिया के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। यह निर्णय प्रमुख खाड़ी सहयोगियों— विशेषकर कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के हस्तक्षेप और उनके शांति प्रयासों के बाद लिया गया है।
एयर फोर्स वन से ट्रम्प का बड़ा ऐलान वाशिंगटन लौटते समय एयर फोर्स वन में सवार होकर पत्रकारों से बातचीत करते हुए, राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिका के कूटनीतिक रुख में आए इस बड़े बदलाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी। ट्रम्प ने उम्मीद जताई कि यह बातचीत न केवल दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध को समाप्त करेगी, बल्कि किसी भी तरह के सैन्य टकराव को भी टालने में मदद करेगी। उन्होंने कहा, “हम उनके (ईरानियों) साथ बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने जा रहे हैं; यह बातचीत कल दोपहर से शुरू होगी, और हम देखेंगे कि इसका क्या परिणाम निकलता है। मैं कूटनीतिक रास्ता अपनाना अधिक पसंद करूंगा। ईमानदारी से कहूं तो, यह कई जिंदगियों को बचाएगा और अनावश्यक सैन्य ताकत के प्रदर्शन को भी रोकेगा।”
उनका यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच संबंध बेहद तल्ख रहे हैं। दोनों देशों के बीच बयानबाजी ने एक ऐसे युद्ध की आशंकाओं को जन्म दे दिया था जो पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता था।
‘द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा हमला’ इस दौरान ट्रम्प ने एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा किया जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिकी सेना ने रविवार के लिए ईरान पर एक बेहद बड़े और विनाशकारी हमले की तैयारी पूरी कर ली थी। ट्रम्प के शब्दों में, यह “द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा सैन्य हमला” होने वाला था। अमेरिकी नौसेना, वायु सेना और विशेष बलों को पूरी तरह से अलर्ट पर रखा गया था।
हालांकि, इस हमले को अंतिम समय में रोक दिया गया। ट्रम्प ने बताया कि उन्होंने खाड़ी क्षेत्र के नेताओं के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद इस योजना को त्यागने का फैसला किया। खाड़ी नेताओं, विशेष रूप से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और यूएई व कतर के शीर्ष अधिकारियों ने वाशिंगटन को चेतावनी दी थी कि इस तरह की सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर देगी। ट्रम्प ने सऊदी क्राउन प्रिंस के साथ अपनी बातचीत का हवाला देते हुए कहा, “मैंने क्राउन प्रिंस से पूछा कि आप क्या चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि हम यह हमला करें या नहीं? उन्होंने जवाब दिया कि वे हमले के बजाय समझौते को अधिक प्राथमिकता देंगे, क्योंकि कोई नहीं जानता कि इन हमलों का अंतिम परिणाम क्या होगा और यह आग कहां तक फैलेगी।”
खाड़ी देशों की मध्यस्थता और शांति की अपील इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब, यूएई और कतर की भूमिका बेहद अहम रही है। ऐतिहासिक रूप से, ये देश ईरान को अपने लिए एक बड़ा खतरा मानते रहे हैं, लेकिन एक पूर्ण विकसित युद्ध उनके अपने आर्थिक और ढांचागत अस्तित्व के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है। युद्ध की स्थिति में इन देशों के तेल रिफाइनरियों, बंदरगाहों और व्यापारिक मार्गों के नष्ट होने का सीधा खतरा था। इसी वजह से इन देशों ने अमेरिका से संयम बरतने और ईरान के साथ एक और बार कूटनीतिक प्रयास करने की पुरजोर अपील की। ट्रम्प ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि वे मुख्य रूप से खाड़ी देशों के आग्रह पर ही बातचीत की मेज पर वापस लौटे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व आगामी वार्ता का मुख्य केंद्र बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) होने वाला है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है। युद्ध शुरू होने से पहले, दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता था। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले वार्ताओं के विफल होने का एक बड़ा कारण इसी जलमार्ग को लेकर मतभेद था।
ट्रम्प प्रशासन का स्पष्ट रुख है कि कोई भी नया समझौता यह सुनिश्चित करे कि होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और व्यापार के लिए स्थायी रूप से खुला रहे, और उस पर किसी भी प्रकार का व्यवधान न हो। वहीं, ईरान लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग पर उसका संप्रभु नियंत्रण (sovereign control) बना रहना चाहिए। सोमवार से शुरू होने वाली बातचीत में यह मुद्दा सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण होने की उम्मीद है।
परमाणु निरस्त्रीकरण (Denuclearisation) और भविष्य का रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य के अलावा, ईरान का परमाणु कार्यक्रम बातचीत का एक अन्य प्रमुख स्तंभ होगा। अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से समाप्त करने (denuclearisation) की मांग कर रहा है। ट्रम्प ने रविवार को दोहराया कि एक व्यापक समझौते के तहत ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी अमेरिकी चिंताओं का पूरी तरह से समाधान होना चाहिए।
यह कूटनीतिक मोड़ ऐसे समय में आया है जब महज एक दिन पहले ही ट्रम्प ने ईरान के साथ बातचीत से “भरोसा उठने” की बात कही थी और चेतावनी दी थी कि अमेरिकी सेना उन पर “बहुत जोर से प्रहार” करेगी। कुछ ही घंटों में युद्ध के बयानों से शांति वार्ता की ओर यह स्थानांतरण दर्शाता है कि पर्दे के पीछे कितनी गहन कूटनीति चल रही थी।
अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सोमवार से शुरू होने वाली इस वार्ता में क्या सहमति बनती है। क्या ईरान अपनी संप्रभुता के दावों में कोई ढील देगा? क्या अमेरिका ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में कोई राहत देने पर विचार करेगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो मध्य पूर्व के भविष्य और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता को तय करेंगे। एक बात स्पष्ट है—भले ही युद्ध के बादल फिलहाल छंटते नजर आ रहे हैं, लेकिन कूटनीति का यह रास्ता भी कांटों से भरा है और शांति की अंतिम मंजिल अभी काफी दूर है।
