अभिजीत दिपके का आरोप: इंस्टाग्राम पर ‘क्रैकडाउन’, रोज हजारों पोस्ट और अकाउंट हटाने का दावा
अभिजीत दिपके का आरोप: इंस्टाग्राम पर 'क्रैकडाउन', रोज हजारों पोस्ट और अकाउंट हटाने का दावा
नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने बुधवार को केंद्र सरकार पर इंस्टाग्राम पर आलोचनात्मक सामग्री के खिलाफ कार्रवाई कराने का आरोप लगाया। उनका दावा है कि हर दिन हजारों पोस्ट और अकाउंट हटाए या प्रतिबंधित किए जा रहे हैं। इस बीच कई सैटायर क्रिएटर्स, कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों ने भी अपनी पोस्ट हटने की शिकायत की है।
दिपके ने क्या कहा
दिपके ने बुधवार सुबह X पर लिखा कि इंस्टाग्राम पर की जा रही यह कार्रवाई कारगर नहीं होगी। उनके मुताबिक सरकार हजारों पोस्ट और अकाउंट हटा रही है, लेकिन असली बात उसकी नजर से छूट रही है। उन्होंने कहा कि इंस्टाग्राम सिर्फ एक मंच है, जहां लोग अपने सवाल उठा रहे हैं, और इन सवालों की वजहें सोशल मीडिया से कहीं बाहर हैं। उनकी चेतावनी है कि इस तरह की सेंसरशिप से उन्हीं लोगों में अविश्वास बढ़ सकता है, जिनके प्रति सरकार जवाबदेह है।
आशुतोष रांका का दावा
CJP के एक अन्य नेता आशुतोष रांका ने 26 अक्टूबर को X पर दावा किया था कि भारत में हजारों इंस्टाग्राम अकाउंट प्रतिबंधित किए गए हैं और लाखों वीडियो हटाए गए हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा की भूमिका पर भी सवाल उठाए। हालांकि रिपोर्टों के अनुसार इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
लाइवलॉ की रील भी हटी
कानूनी खबरों की वेबसाइट लाइवलॉ ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के हलफनामे से जुड़ी उसकी इंस्टाग्राम रील हटा दी गई। रिपोर्टों के मुताबिक इंस्टाग्राम ने संदेश दिखाया कि उसे इस सामग्री को ब्लॉक करने का कानूनी अनुरोध मिला है। दिपके की ओर से साझा किए गए स्क्रीनशॉट में भी यही संकेत था कि सामग्री भारत के आईटी कानून के तहत कानूनी जरूरत के चलते रोकी गई।
क्या कहता है कानून
ऐसे मामलों में अक्सर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए का जिक्र होता है। यह प्रावधान केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता जैसे आधारों पर ऑनलाइन सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच रोकने का आदेश देने की शक्ति देता है। कार्यकर्ता और राजनीतिक समूह इस प्रावधान के तहत खातों और पोस्ट को रोके जाने पर आपत्ति जता रहे हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं
डिजिटल अधिकार संगठन SFLC.in ने 1 से 18 अक्टूबर के बीच भारत में पोस्ट, पेज और अकाउंट पर प्रतिबंध के 181 मामले दर्ज किए, जिनमें कुल 382 आइटम शामिल थे। यह संख्या दिपके और रांका के बताए हजारों-लाखों के दावे से बहुत कम है, हालांकि दोनों आंकड़ों का दायरा और अवधि अलग हैं, इसलिए सीधी तुलना नहीं की जा सकती। रिपोर्टों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 10 अक्टूबर को मेटा को फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कंटेंट की सिफारिश के तरीके को लेकर एक एडवाइजरी भी जारी की थी।
दिल्ली हाईकोर्ट में भी पहुंचा मामला
इसी बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने “बिंग बैक बैलट” नाम के ब्लॉक किए गए हैंडल पर केंद्र से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह हैंडल 10 अक्टूबर को, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन वाले दिन, भारत में अनुपलब्ध हो गया था। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर को होनी है।
CJP और सोशल मीडिया पर पहले भी हुए टकराव
CJP की स्थापना 16 मई 2026 को हुई थी और यह खुद को व्यंग्य के जरिए युवाओं की आवाज उठाने वाला मंच बताती है। इससे पहले भी इसके डिजिटल खातों को लेकर विवाद हो चुका है:
- 21 मई: पार्टी का X अकाउंट भारत में withheld किया गया।
- 23 मई: दिपके ने इंस्टाग्राम अकाउंट हैक होने और वेबसाइट बंद होने का आरोप लगाया।
- 7 जुलाई: दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP का मूल X अकाउंट @CJP_2029 तुरंत अनब्लॉक करने का आदेश दिया।
- 22 जुलाई: पार्टी का इंस्टाग्राम अकाउंट कुछ समय के लिए भारत में अनुपलब्ध दिखा, फिर बहाल हो गया।
अक्टूबर में पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया था। उस दौरान सुरक्षा और पाबंदियों को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी हुई।
सरकार और मेटा का पक्ष
अब तक की रिपोर्टों में केंद्र सरकार या मेटा की ओर से इन ताजा आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि इस बात का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है कि कार्रवाई का पैमाना उतना बड़ा है, जितना दावा किया जा रहा है। यह भी साफ नहीं है कि हर प्रतिबंध केंद्र के आदेश पर ही हुआ है या कुछ मामलों में प्लेटफॉर्म की अपनी नीतियों के तहत।
आगे क्या
अब नजर दिल्ली हाईकोर्ट की 6 नवंबर की सुनवाई पर रहेगी, जहां ब्लॉक किए गए हैंडल पर केंद्र का जवाब आएगा। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि मेटा या सरकार इन दावों पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं। यह मामला ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी और ब्लॉकिंग की प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे सवालों को एक बार फिर सामने ला रहा है।
