गौतम अडानी को बड़ी राहत: अमेरिकी कोर्ट ने खारिज किया क्रिमिनल केस, जानें पूरा मामला
गौतम अडानी को बड़ी राहत: अमेरिकी कोर्ट ने खारिज किया क्रिमिनल केस, जानें पूरा मामला
न्यूयॉर्क / नई दिल्ली (11 अगस्त, 2026): भारतीय अरबपति और अडानी ग्रुप (Adani Group) के चेयरमैन गौतम अडानी (Gautam Adani) के लिए अमेरिका से एक बेहद शानदार और राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका की एक संघीय अदालत (US Federal Court) ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और अडानी ग्रीन एनर्जी के पूर्व सीईओ विनीत जैन के खिलाफ चल रहे धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के बहुचर्चित आपराधिक मामले (Criminal Case) को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
नवंबर 2024 से चल रही इस कानूनी लड़ाई ने वैश्विक स्तर पर अडानी समूह की प्रतिष्ठा और व्यापार पर दबाव बना रखा था। लेकिन अब यूएस कोर्ट के इस फैसले ने अडानी समूह को एक ‘क्लीन चिट’ जैसी राहत दी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि अमेरिकी कोर्ट ने यह फैसला क्यों लिया, अमेरिकी न्याय विभाग ने केस क्यों वापस लिया और इस फैसले का क्या असर होगा।
अदालत का फैसला: केस ‘विद प्रिज्युडिस’ (With Prejudice) खारिज
यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट फॉर द ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क (US District Court for the Eastern District of New York) के जज निकोलस गारौफिस (Nicholas Garaufis) ने सोमवार, 10 अगस्त 2026 को अपना अंतिम आदेश पारित किया। जज ने अमेरिकी न्याय विभाग (US Justice Department) के रूल 48(a) के तहत पेश किए गए उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, जिसमें अभियोजन पक्ष ने मामले को रद्द करने की मांग की थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने इस मामले को “विद प्रिज्युडिस” (Dismissed With Prejudice) के तौर पर खारिज किया है। कानूनी शब्दावली में इसका अर्थ है कि इस मामले को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। अमेरिकी सरकार भविष्य में इन्हीं आरोपों के आधार पर गौतम अडानी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ दोबारा कोई क्रिमिनल केस दायर नहीं कर सकेगी। इन तीनों अधिकारियों पर ‘सिक्योरिटीज फ्रॉड’ (Securities Fraud), ‘वायर फ्रॉड’ और इन दोनों की साजिश रचने के गंभीर आरोप लगाए गए थे, जो अब पूरी तरह से खत्म हो गए हैं।
क्या था पूरा मामला और आरोप?
यह पूरा विवाद नवंबर 2024 में शुरू हुआ था। अमेरिकी अभियोजकों (US Prosecutors) ने आरोप लगाया था कि अडानी समूह की कंपनियों ने भारत में आकर्षक सौर ऊर्जा आपूर्ति अनुबंध (Solar Power Contracts) हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को लगभग 265 मिलियन डॉलर (करीब 2,200 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने का वादा किया था।
आरोप में यह भी कहा गया था कि इस कथित रिश्वतखोरी को छिपाकर, कंपनी ने अमेरिकी निवेशकों और बैंकों को गुमराह किया और अंतरराष्ट्रीय बाजार से अरबों डॉलर का फंड जुटाया। अडानी समूह ने शुरू से ही इन आरोपों को “निराधार” बताया था और स्पष्ट किया था कि समूह सभी लागू कानूनों और विनियामक आवश्यकताओं (Regulatory Requirements) का सख्ती से पालन करता है।
न्याय विभाग (DOJ) ने क्यों वापस लिया केस?
मई 2026 में, ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग ने यह घोषणा की कि वह इस हाई-प्रोफाइल मामले में आगे मुकदमा नहीं चलाना चाहता। न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैक्कोटर (Trent McCotter) ने मामले की समीक्षा के बाद तर्क दिया कि कथित रिश्वतखोरी लगभग पूरी तरह से भारत में हुई थी, जिससे अमेरिकी अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का एक जटिल विवाद पैदा हो रहा था।
इसके अलावा, सरकार ने यह भी माना कि कंपनी की भ्रष्टाचार-विरोधी नीतियों के बारे में निवेशकों को दिए गए बयान केवल “इन्एक्शनेबल पफ्री” (Inactionable Puffery) के दायरे में आ सकते हैं—यानी ऐसे सामान्य और व्यापक बयान जिन पर कोई भी समझदार निवेशक पूरी तरह निर्भर होकर निवेश का फैसला नहीं करता। इन तर्कों के आधार पर न्याय विभाग ने केस वापस लेना ही उचित समझा।
जज ने जताई प्रक्रिया पर चिंता: बताया “बेहद असामान्य”
हालांकि जज निकोलस गारौफिस ने केस खारिज करने का आदेश दे दिया, लेकिन उन्होंने ट्रंप प्रशासन के न्याय विभाग के काम करने के तरीके की कड़ी आलोचना की। जज ने अपने लिखित आदेश में इसे “बेहद असामान्य” (Highly Unusual) करार दिया।
जज ने इस बात पर चिंता जताई कि ट्रेंट मैक्कोटर ने मामले को रद्द करने का फैसला मुख्य रूप से अडानी के बचाव पक्ष के वकीलों के साथ मिलकर किया। इस प्रक्रिया में उन एफबीआई (FBI) और एसईसी (SEC) एजेंटों से कोई राय नहीं ली गई, जिन्होंने इस कथित कदाचार की सालों तक जांच की थी।
10 अरब डॉलर के निवेश के वादे की भी हुई जांच
इस केस में एक बड़ा मोड़ तब आया जब यह खबर सामने आई कि गौतम अडानी के वकीलों ने अमेरिकी न्याय विभाग को बताया था कि अगर आरोप हटा लिए जाते हैं, तो अडानी ग्रुप अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर (10 Billion Dollars) का निवेश करने के लिए तैयार है।
जज ने इस बात की गंभीरता से जांच की कि कहीं यह निवेश प्रस्ताव न्याय विभाग के फैसले को प्रभावित तो नहीं कर रहा था (Quid Pro Quo)। इसके जवाब में गौतम अडानी ने अदालत में एक हलफनामा (Sworn Affidavit) दाखिल कर स्पष्ट रूप से इनकार किया कि केस रद्द करवाने के एवज में सरकार के साथ कोई गुप्त समझौता या सौदा हुआ है। हलफनामे और सरकारी जवाबों की समीक्षा करने के बाद जज इस बात से संतुष्ट हुए कि 10 अरब डॉलर के निवेश के वादे ने कानूनी कार्यवाही को प्रभावित नहीं किया।
गौतम अडानी की सकारात्मक प्रतिक्रिया
अमेरिकी कोर्ट से मिली इस बड़ी कानूनी जीत के बाद गौतम अडानी ने फैसले का स्वागत किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर उन्होंने लिखा:
“मैं न्यायपालिका के प्रति पूरी विनम्रता और गहरे सम्मान के साथ अमेरिकी अदालत के फैसले का स्वागत करता हूं। इस चुनौतीपूर्ण दौर में, सत्य, निष्पक्षता और कानून के शासन (Rule of Law) में हमारा विश्वास अडिग रहा। उन सभी के प्रति मेरा गहरा आभार जिन्होंने हम पर, हमारी प्रणाली पर और न्याय की क्षमता पर कभी विश्वास नहीं खोया।”
सिविल दावों (SEC Claims) का सेटलमेंट
आपराधिक मुकदमा खारिज होने के साथ-साथ, गौतम और सागर अडानी ने अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (US SEC) द्वारा दायर किए गए संबंधित दीवानी मुकदमों (Civil Proceedings) का भी निपटारा कर लिया है। बिना अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार किए, गौतम अडानी ने 6 मिलियन डॉलर और सागर अडानी ने 12 मिलियन डॉलर चुकाने पर सहमति जताई है। इसके अलावा, एक अलग मामले में ईरान प्रतिबंधों के कथित उल्लंघन के विवाद को सुलझाने के लिए ‘अडानी एंटरप्राइजेज’ (Adani Enterprises) ने भी अमेरिकी ट्रेजरी विभाग को 275 मिलियन डॉलर के सेटलमेंट का भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की है।
निष्कर्ष
गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी अदालत द्वारा इस क्रिमिनल केस को खारिज किया जाना (Case Dismissed) वैश्विक कॉर्पोरेट जगत की एक बड़ी घटना है। दो सालों से जिस कानूनी तलवार ने अडानी समूह के शेयरधारकों और निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना रखा था, वह अब पूरी तरह हट चुकी है। यह जीत न केवल गौतम अडानी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को बहाल करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अडानी समूह के व्यापारिक विस्तार और विश्वसनीयता को भी एक नई ऊर्जा प्रदान करेगी।
