प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों पर गरमाई राजनीति: अमेरिकी सांसद रिले मूर की तीखी टिप्पणी से भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव की आशंका
प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों पर गरमाई राजनीति: अमेरिकी सांसद रिले मूर की तीखी टिप्पणी से भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव की आशंका
भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), चैरिटेबल ट्रस्टों और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी फंड को विनियमित करने वाले कानून ‘फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ (FCRA) में किए जाने वाले प्रस्तावित संशोधनों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छेड़ दी है। भारत के इस आंतरिक विधायी कदम पर अमेरिका के एक प्रमुख सांसद ने आपत्ति जताई है, जिसके बाद से कूटनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। वेस्ट वर्जीनिया से अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद रिले मूर (Riley Moore) ने भारत के प्रस्तावित ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026) की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे “ईसाइयों पर सीधा हमला” करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ता है, तो यह भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़ा तनाव पैदा कर सकता है।
प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) मूल रूप से भारत में व्यक्तियों, संघों और कंपनियों द्वारा विदेशी योगदान की स्वीकृति और उसके उपयोग को विनियमित करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंडिंग से देश की आंतरिक सुरक्षा, संप्रभुता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं प्रभावित न हों। समय-समय पर इस कानून में संशोधन किए जाते रहे हैं ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।
लोकसभा में पेश किए गए नए 2026 के संशोधन विधेयक के तहत, यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द कर दिया जाता है, वह स्वेच्छा से इसे सरेंडर कर देता है, या गृह मंत्रालय द्वारा उसका लाइसेंस नवीनीकृत नहीं किया जाता है, तो ऐसे संगठनों की विदेशी फंडिंग से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया गया है।
कानून के तहत एक ‘नामित प्राधिकारी’ (Designated Authority) के गठन का प्रस्ताव है, जो ऐसी संपत्तियों की देखरेख करेगा। विधेयक में विशेष रूप से यह प्रावधान भी जोड़ा गया है कि यदि ऐसी संपत्तियों में कोई धार्मिक स्थल (जैसे चर्च, मंदिर या मस्जिद) शामिल है, तो प्राधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका धार्मिक स्वरूप सुरक्षित रहे। हालांकि, इसके साथ ही नियमों का उल्लंघन करने पर सजा के प्रावधान को कड़ा करने के बजाय अधिकतम पांच साल की जेल की सजा को घटाकर एक साल कर दिया गया है।
अमेरिकी सांसद रिले मूर का तीखा बयान
अमेरिकी सांसद रिले मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा करते हुए इन संशोधनों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका मुख्य निशाना इस बात पर था कि नए नियमों से ईसाई संस्थानों और चैरिटी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
मूर ने भारत में ईसाई धर्म के लंबे इतिहास का हवाला देते हुए लिखा, “प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद जब संत थॉमस ने मालाबार तट की यात्रा की थी, तब से ईसाई भारत में मौजूद हैं। लेकिन इतने लंबे इतिहास के बावजूद, भारत की संसद एफसीआरए नियमों में संशोधन करने पर विचार कर रही है ताकि चर्चों और धार्मिक चैरिटी के सरकारी अधिग्रहण की अनुमति मिल सके।” उन्होंने आगे कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए लिखा, “यह ईसाइयों पर सीधा हमला है। यदि यह विधेयक इसी तरह आगे बढ़ता है, तो यह भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों में चिंता का एक बड़ा बिंदु बन जाएगा।”
भारत में तीखी प्रतिक्रिया और घरेलू राजनीतिक बहस
अमेरिकी सांसद के इस बयान के सामने आते ही भारत में सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। देश के एक धड़े ने इसे भारत के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप करार दिया है।
कई भारतीय उपयोगकर्ताओं और वकीलों ने मूर की टिप्पणी का करारा जवाब देते हुए कहा कि विदेशी फंड के नियमन का अधिकार पूरी तरह से एक संप्रभु राष्ट्र का आंतरिक मामला है। जाने-माने सुप्रीम कोर्ट के वकील जे. साई दीपक ने सांसद के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “मजबूत एफसीआरए व्यवस्था की वकालत करने के लिए धन्यवाद। यही वह ‘डीप स्टेट’ है जिसका पर्दाफाश होना जरूरी है।” वहीं, कई अन्य सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने कहा कि यदि अमेरिका इस विधायी बदलाव का खुलकर विरोध कर रहा है, तो इसका मतलब है कि भारत सरकार सही दिशा में काम कर रही है और देश को पीछे नहीं हटना चाहिए।
दूसरी ओर, देश के भीतर भी कुछ नागरिक संगठनों और विपक्षी दलों ने विदेशी फंडिंग के नियमों को और अधिक कड़ा किए जाने पर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। आलोचकों का मानना है कि यदि पंजीकरण रद्द होने पर संपत्तियों के अधिग्रहण के नियम स्पष्ट और पारदर्शी नहीं होंगे, तो इसका असर देश भर में उन तमाम कल्याणकारी संस्थानों, स्कूलों और अस्पतालों पर पड़ सकता है जो अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाते हैं और जिन्हें अतीत में विदेशी सहायता मिलती रही है।
भारत की स्थिति और गृह मंत्रालय का पक्ष
भारतीय अधिकारियों और नीति निर्माताओं ने स्पष्ट किया है कि ये संशोधन किसी खास समुदाय या धर्म को लक्षित करने के लिए नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य देश की वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय सुरक्षा को पुख्ता करना है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत सरकार ने विदेशी चंदे के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियमों को काफी सख्त किया है। सरकार का यह भी कहना है कि जो संगठन कानून के दायरे में रहकर पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रहे हैं, उनके लिए डरने की कोई बात नहीं है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में हजारों एफसीआरए पंजीकरण या तो समय पर नवीनीकृत न होने के कारण समाप्त हो चुके हैं या विभिन्न अनियमितताओं के चलते रद्द किए गए हैं।
भारत-अमेरिका कूटनीतिक रिश्तों पर संभावित असर
हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से इस विशिष्ट विधेयक को लेकर कोई आधिकारिक और कड़ा कूटनीतिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सदस्यों द्वारा इस तरह की बयानबाजी से वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिक संवाद में असहजता पैदा हो सकती है।
वर्तमान में भारत और अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदार हैं और रक्षा, तकनीक तथा व्यापार के मोर्चे पर एक-दूसरे के बेहद करीब हैं। इसके बावजूद, भारत में मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और गैर-सरकारी संगठनों के कामकाज से जुड़े मुद्दों पर अमेरिकी सांसदों की तीखी टिप्पणियां अक्सर दोनों देशों के रिश्तों में कूटनीतिक दबाव का काम करती हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में भारत सरकार इन विदेशी दबावों के बीच अपने घरेलू कानूनों को किस प्रकार आगे बढ़ाती है और इस कूटनीतिक गतिरोध को कैसे संभालती है।
