पीओके में हालात बेकाबू: पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर दागे आंसू गैस के गोले, 11 की मौत, इंटरनेट ठप

0
पीओके में हालात बेकाबू: पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर दागे आंसू गैस के गोले, 11 की मौत, इंटरनेट ठप

पीओके में हालात बेकाबू: पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर दागे आंसू गैस के गोले, 11 की मौत, इंटरनेट ठप

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में हालात विस्फोटक हो गए हैं। बुनियादी अधिकारों, आसमान छूती महंगाई, और आटे-बिजली के संकट को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन अब एक हिंसक जनआंदोलन में तब्दील हो चुका है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रदर्शनकारियों के बीच हुई भीषण हिंसक झड़पों ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के मैदान में बदल दिया है। रावलकोट, मुजफ्फराबाद और मीरपुर जैसे प्रमुख शहरों में पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस ने निहत्थे नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागे हैं और लाठीचार्ज किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा बलों की सीधी फायरिंग और क्रूर कार्रवाई में कम से कम 11 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने पूरे इलाके में संचार सेवाएं और इंटरनेट पूरी तरह से ठप कर दिया है, जिससे हालात और भी चिंताजनक हो गए हैं।

विरोध प्रदर्शन का मुख्य कारण और मांगें

पीओके में यह मौजूदा उबाल अचानक नहीं आया है, बल्कि यह दशकों के दमन, आर्थिक शोषण और हालिया प्रशासनिक ज्यादतियों का सीधा परिणाम है। इस पूरे जन आंदोलन का नेतृत्व ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) कर रही है। समिति ने प्रशासन के सामने 38 सूत्रीय मांगें रखी हैं। इन मांगों में मुख्य रूप से सस्ती बिजली की आपूर्ति, सब्सिडी वाले गेहूं और आटे की निर्बाध उपलब्धता, और पीओके की क्षेत्रीय विधानसभा में कश्मीरियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करना शामिल है।

स्थानीय जनता का स्पष्ट आरोप है कि इस्लामाबाद की सरकार उनके प्राकृतिक संसाधनों—विशेषकर पनबिजली—का बेरहमी से दोहन कर रही है, लेकिन बदले में स्थानीय लोगों को भारी-भरकम बिजली के बिल थमाए जा रहे हैं। इसके अलावा, आटे की भीषण कमी और उसकी कालाबाजारी ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। स्थिति तब नियंत्रण से बाहर हो गई जब शुक्रवार, 5 जून 2026 को पाकिस्तानी प्रशासन ने जन असंतोष को दबाने के लिए JAAC पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध के तुरंत बाद समिति के दर्जनों नेताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को रातों-रात गिरफ्तार कर लिया गया। इस दमनकारी कदम ने आग में घी का काम किया और आक्रोशित लोग भारी संख्या में सड़कों पर उतर आए।

मैदानी हालात: खौफ का माहौल और संचार ब्लैकआउट

मंगलवार (9 जून) को पीओके के विभिन्न हिस्सों से जो छिटपुट वीडियो और रिपोर्ट्स सामने आई हैं, वे बेहद विचलित करने वाली हैं। रावलकोट में विरोध प्रदर्शन सबसे ज्यादा हिंसक रूप ले चुका है, जहां सुरक्षा बलों ने भीड़ पर कथित तौर पर सीधी फायरिंग की है। पीओके की राजधानी मुजफ्फराबाद में चप्पे-चप्पे पर पाकिस्तानी पुलिस और अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया है। जब नागरिकों ने शांतिपूर्ण मार्च निकालने की कोशिश की, तो उन पर बेरहमी से आंसू गैस के गोले दागे गए और लाठियां बरसाई गईं।

पूरे पीओके में इस वक्त एक अघोषित कर्फ्यू जैसी स्थिति है। स्कूल, कॉलेज, बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठान पूरी तरह से बंद हैं। लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं। स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, प्रशासन ने बाहरी दुनिया तक अत्याचार की आवाज़ को पहुंचने से रोकने के लिए मोबाइल डेटा, ब्रॉडबैंड और कई जगहों पर लैंडलाइन सेवाओं को भी पूरी तरह काट दिया है। अस्पतालों में घायलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन इंटरनेट न होने के कारण हताहतों की सटीक जानकारी बाहर नहीं आ पा रही है। पुलिस द्वारा घर-घर जाकर की जा रही छापेमारी ने आम लोगों में गहरी दहशत पैदा कर दी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजी पीओके की आवाज

पीओके में हो रहे इस क्रूर दमन की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगी है। ब्रिटेन में बसे कश्मीरी प्रवासियों ने पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावासों के बाहर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। 9 जून को ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर भारी भीड़ जमा हुई और उन्होंने निहत्थे नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना के बल प्रयोग की कड़ी निंदा की।

इसके साथ ही, ब्रिटिश संसद के लगभग 30 से अधिक सांसदों के एक समूह ने भी इस क्रूरता पर कड़ा संज्ञान लिया है। ‘ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑन कश्मीर’ के अध्यक्ष और ब्रैडफोर्ड ईस्ट के सांसद इमरान हुसैन के नेतृत्व में इन सांसदों ने ब्रिटिश विदेश सचिव को एक पत्र लिखा है। पत्र में पीओके में चल रहे “कम्युनिकेशन ब्लैकआउट”, मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन, और निहत्थे लोगों की हत्याओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। ब्रिटिश सांसदों ने अपनी सरकार से मांग की है कि वह इस मामले में कूटनीतिक हस्तक्षेप करे और पाकिस्तान पर दबाव बनाए ताकि क्षेत्र में तुरंत शांति बहाल हो सके और गिरफ्तार किए गए लोगों को बिना शर्त रिहा किया जाए।

वादों से मुकरती शहबाज़ शरीफ सरकार

पीओके के लोगों का गुस्सा इसलिए भी उफान पर है क्योंकि पाकिस्तान की शहबाज़ शरीफ सरकार लगातार अपने वादों से मुकरती रही है। इससे पहले मई 2023 और 2024 में भी ऐसे ही बड़े हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय इस्लामाबाद ने स्थिति को शांत करने के लिए बिजली और आटे की कीमतों में करोड़ों रुपये की सब्सिडी देने का वादा किया था। लेकिन वे वादे सिर्फ कागजों और अस्थाई राहत तक ही सीमित रहे। जैसे ही हालात थोड़े सामान्य हुए, सरकार ने फिर से अपनी नीतियां बदल दीं।

इसके अलावा, राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन एक बहुत बड़ा मुद्दा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस्लामाबाद पीओके को केवल एक उपनिवेश (colony) की तरह इस्तेमाल करता है। वहां के प्रशासन और पुलिस के उच्च पदों पर बाहरी (पाकिस्तानी पंजाब और अन्य प्रांतों के) अधिकारियों का दबदबा है, जो स्थानीय कश्मीरियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं।

निष्कर्ष: पाकिस्तान का दोहरा चरित्र उजागर

पाकिस्तान के लिए पीओके में उठ रही यह बगावत अब एक ऐसी चुनौती बन गई है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस क्रूरता के साथ पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस इस नागरिक आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि इस्लामाबाद अब बातचीत के बजाय हथियारों के बल पर अपना नियंत्रण थोपना चाहता है। हालांकि, JAAC के नेताओं ने भूमिगत रहते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी 38 सूत्रीय मांगें पूरी नहीं होतीं, यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।

भारत हमेशा से यह स्पष्ट करता आया है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं और पाकिस्तान ने अवैध रूप से पीओके पर कब्जा किया हुआ है। पीओके में मानवाधिकारों के इस खुले उल्लंघन ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को बेनकाब कर दिया है। एक तरफ पाकिस्तान दुनिया भर के मंचों पर मानवाधिकारों का झूठा रोना रोता है, वहीं दूसरी तरफ अपने ही अवैध कब्जे वाले क्षेत्र में निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसा रहा है। आने वाले दिन पीओके के लिए बेहद संवेदनशील होने वाले हैं, और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुककर जनहित के फैसले लेता है या अपने अलोकतांत्रिक और दमनकारी रवैये को और तेज करता है।

Please follow and like us:
Pin Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed