महायुति गठबंधन में दरार? मंत्रियों की बैठक के बाद भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) में तनाव बढ़ा
महायुति गठबंधन में दरार? मंत्रियों की बैठक के बाद भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) में तनाव बढ़ा
मुंबई — महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से उथल-पुथल मच गई है। सत्तारूढ़ महायुति (Mahayuti) गठबंधन के भीतर बढ़ती खींचतान ने राज्य की राजनीतिक स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच तनाव पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से बढ़ा है। यह कलह मुख्य रूप से मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR), विशेषकर कल्याण-डोंबिवली बेल्ट में नेताओं की खरीद-फरोख्त (पोचिंग) और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर शुरू हुई है।
हाल ही में राज्य मंत्रिमंडल की एक महत्वपूर्ण बैठक से शिवसेना (शिंदे गुट) के कई मंत्रियों के नदारद रहने के बाद यह दरार खुलकर सामने आ गई है, जिसने गठबंधन के भविष्य को लेकर अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है।
कल्याण-डोंबिवली बना राजनीतिक अखाड़ा
विवाद की सबसे बड़ी जड़ मुंबई के करीब स्थित कल्याण-डोंबिवली क्षेत्र बना हुआ है। यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से शिवसेना का गढ़ रहा है, लेकिन अब यह दोनों सहयोगी दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का केंद्र बन गया है।
हाल ही के दिनों में इस क्षेत्र में दल-बदल की कई घटनाएं देखने को मिली हैं:
- शुरुआती झटके: पिछले हफ्ते, शिंदे गुट की शिवसेना ने भाजपा के पांच पूर्व नगरसेवकों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया था।
- भाजपा का पलटवार: इसके जवाब में, भाजपा ने डोंबिवली (जो कि मुख्यमंत्री शिंदे का मजबूत गढ़ माना जाता है) से शिवसेना नेता अनमोल म्हात्रे और उनकी पत्नी अश्विनी म्हात्रे को भाजपा में शामिल कर लिया। इसके तुरंत बाद चार अन्य पूर्व शिवसेना नगरसेवक भी भाजपा में चले गए।
- ताजा घटनाक्रम: मंगलवार को छत्रपति संभाजीनगर और नासिक से भी कई शिवसेना नेता भाजपा में शामिल हो गए।
शिंदे गुट के बागी नेताओं का आरोप है कि उन्हें पार्टी में हाशिए पर धकेला जा रहा था। भाजपा में शामिल होने वाले एक नेता ने कहा, “पार्टी के लिए अथक प्रयास करने के बावजूद हमें लगातार नजरअंदाज किया गया। हमें सही समय पर उचित पद नहीं दिए गए।”
कैबिनेट बैठक का बहिष्कार और फडणवीस की सख्त हिदायत
इन घटनाओं से नाराज होकर, मंगलवार को हुई राज्य कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक से शिवसेना (शिंदे गुट) के अधिकांश मंत्री अनुपस्थित रहे। केवल उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ही बैठक में शामिल हुए। सूत्रों के अनुसार, यह मंत्रियों का विरोध दर्ज कराने का एक तरीका था।
बैठक से पहले गुलाबराव पाटिल, संजय शिरसाट और प्रताप सरनाइक सहित शिवसेना के चार मंत्रियों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (भाजपा) से मुलाकात की और अपनी पार्टी के नेताओं को भाजपा में शामिल किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई।
“मुख्यमंत्री फडणवीस ने शिवसेना के मंत्रियों को स्पष्ट रूप से बताया कि स्थानीय स्तर पर नेताओं को तोड़ने की शुरुआत खुद शिवसेना ने उल्हासनगर से की थी। मुख्यमंत्री ने सख्त हिदायत दी है कि महायुति गठबंधन में शामिल किसी भी दल को अब से एक-दूसरे के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करना चाहिए।”
— राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री (पहचान गुप्त रखने की शर्त पर)
स्कूली शिक्षा मंत्री दादा भुसे ने भी पुष्टि की कि मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्थिति को संभालने के लिए अपनी पार्टी के नेताओं को भी इसी तरह के निर्देश देने का आश्वासन दिया है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी मीडिया से बातचीत में कहा, “देवेंद्र फडणवीस और मेरा मानना है कि गठबंधन सुचारू रूप से चलना चाहिए। इसलिए बैठक में यह तय किया गया है कि भविष्य में इस तरह की दल-बदल की गतिविधियां तुरंत बंद होनी चाहिए।”
बीएमसी चुनावों की छाया और गठबंधन का ‘ट्रिपल-इंजन’ भार
कल्याण-डोंबिवली में जो कुछ हो रहा है, वह असल में 2026 में हुए बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनावों के बाद उपजे असंतोष का ही एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि भाजपा-नीत गठबंधन ने बीएमसी चुनावों में शानदार जीत दर्ज कर उद्धव ठाकरे गुट के दशकों पुराने वर्चस्व को खत्म कर दिया था, लेकिन अब असली लड़ाई मुंबई के ‘मेयर’ (महापौर) पद को लेकर है।
| पार्टी | बीएमसी में जीती गई सीटें |
| भाजपा | 89 सीटें |
| शिवसेना (एकनाथ शिंदे) | 29 सीटें |
आंकड़ों में भाजपा स्पष्ट रूप से हावी है, लेकिन शिंदे गुट मेयर पद पर अपना दावा ठोक रहा है। या फिर कम से कम ऐसी रोटेशनल (बारी-बारी) व्यवस्था चाहता है जिसमें आधा कार्यकाल उनके उम्मीदवार को मिले। शिंदे गुट को डर है कि कहीं भाजपा उनके विधायकों और पार्षदों को अपने पाले में न कर ले, जिसके चलते पिछले दिनों शिंदे गुट को अपने 29 नवनिर्वाचित बीएमसी पार्षदों को एक पांच सितारा होटल में ठहराने (Resort Politics) की नौबत भी आ गई थी।
महायुति असल में एक “ट्रिपल-इंजन” सरकार है, जिसमें भाजपा, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (NCP) शामिल हैं। यह गठबंधन विपक्ष (महा विकास अघाड़ी) को रोकने और ‘लड़की बहिन योजना’ जैसी लोकलुभावन योजनाओं को लागू करने में तो सफल रहा है, लेकिन सत्ता के बंटवारे को लेकर भारी अंदरूनी कलह से जूझ रहा है।
आगे का रास्ता: क्या महायुति एकजुट रह पाएगी?
भाजपा के वरिष्ठ नेता और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने गठबंधन में किसी भी तरह की दरार की खबरों को खारिज करते हुए इसे केवल चुनावी महत्वाकांक्षा बताया है। उन्होंने कहा, “चूंकि कई वर्षों बाद चुनाव हो रहे हैं, इसलिए जिन्हें अवसर की उम्मीद है, वे एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कूद रहे हैं।”
हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) के नेता आदित्य ठाकरे ने इस कलह पर तंज कसते हुए ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि कैबिनेट बैठकें महाराष्ट्र की समस्याओं को हल करने के लिए होती हैं, “किसी के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए नहीं।”
दिसंबर 2025 से शुरू होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले महायुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कुनबे को एकजुट रखना है। भाजपा को अपने आक्रामक कार्यकर्ताओं को शांत करना होगा जो जीत का इनाम चाहते हैं, वहीं एकनाथ शिंदे को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बड़े सहयोगी दल के वर्चस्व के आगे उनकी पार्टी अपनी पहचान न खो दे। फिलहाल तो इस ट्रिपल-इंजन सरकार का हनीमून पीरियड खत्म होता दिख रहा है, और वर्चस्व की असली राजनीतिक लड़ाई अब शुरू हो चुकी है।
