ममता के पास अब बचे कितने सांसद? टीएमसी नेता सौगत रॉय ने खोला काकोली घोष दस्तीदार की बगावत का असली राज
ममता के पास अब बचे कितने सांसद? टीएमसी नेता सौगत रॉय ने खोला काकोली घोष दस्तीदार की बगावत का असली राज
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय भयंकर भूचाल आया हुआ है। ममता बनर्जी की अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने इतिहास के सबसे बड़े और गहरे संकट से गुजर रही है। पार्टी की दिग्गज नेता और लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 सांसदों की बगावत ने न केवल टीएमसी के अभेद्य किले में बड़ी सेंध लगा दी है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह से पलट कर रख दिया है। इन बागी सांसदों के एनडीए (NDA) में शामिल होने की औपचारिक सुगबुगाहट के बीच, सियासी गलियारों और आम जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि आखिर इस महा-बगावत के बाद ममता बनर्जी के पास अब कितने सांसद बचे हैं? इसी गहमागहमी के बीच, टीएमसी के कद्दावर नेता और दमदम से सांसद सौगत रॉय (Saugata Roy) ने इस पूरे विवाद पर अपनी बेबाक टिप्पणी की है। सौगत रॉय ने न केवल बचे हुए सांसदों का सही आंकड़ा स्पष्ट किया है, बल्कि उन्होंने काकोली घोष दस्तीदार की नाराजगी और बगावत के पीछे की असल वजह का भी एक बेहद सनसनीखेज खुलासा किया है।
आंकड़ों का खेल: ममता बनर्जी के साथ अब कितने सांसद?
तृणमूल कांग्रेस ने हालिया लोकसभा चुनावों में एक बार फिर बंगाल में अपना दबदबा साबित करते हुए शानदार प्रदर्शन किया था और 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पार्टी लोकसभा में विपक्ष की एक बेहद मजबूत आवाज बनकर उभर रही थी। लेकिन दिल्ली में रचे गए इस ‘पॉलिटिकल तख्तापलट’ ने टीएमसी की संसदीय ताकत को झकझोर कर रख दिया है। 29 में से 20 लोकसभा सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में एक अलग गुट बना लिया है और लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठने की आधिकारिक अनुमति भी मांग ली है।
इस बगावत का सीधा गणित यह है कि इस समय लोकसभा में ममता बनर्जी के साथ केवल 9 सांसद ही पूरी वफादारी के साथ खड़े हैं। इन बचे हुए 9 वफादार सांसदों में प्रमुख रूप से सौगत रॉय, कीर्ति आजाद, और सुदीप बंद्योपाध्याय जैसे पार्टी के पुराने और समर्पित नेता शामिल हैं। कीर्ति आजाद ने हाल ही में पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करते हुए स्पष्ट किया था कि, “जो पार्टी छोड़कर जाना चाहते हैं, वे खुशी से जा सकते हैं। मैं हमेशा से दीदी के साथ था और मेरा रुख आगे भी कभी नहीं बदलेगा।” हालांकि, 20 सांसदों का एक झटके में पार्टी छोड़ना ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक झटका है। राज्यसभा में भी टीएमसी के 13 सांसद हैं, और अब पार्टी हाईकमान की पूरी नजर इस बात पर है कि कहीं बगावत की यह आग उच्च सदन के गलियारों तक न पहुंच जाए।
सौगत रॉय का विस्फोटक खुलासा: काकोली की नाराजगी की असल वजह
बागी गुट की अगुआ काकोली घोष दस्तीदार ने सार्वजनिक मंचों पर अपनी इस बगावत को “राष्ट्रहित”, “बंगाल के विकास” और “पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी” से जोड़ा था। लेकिन टीएमसी के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने इन सभी दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। सौगत रॉय ने मीडिया से बात करते हुए बेबाकी से कहा कि काकोली की नाराजगी के पीछे कोई बड़ा वैचारिक मतभेद या जनता का हित कतई नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनकी “अत्यधिक व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और सत्ता की लालसा” छिपी हुई है।
सौगत रॉय ने खुलासा किया कि काकोली घोष दस्तीदार पिछले कई महीनों से पार्टी के भीतर घुटन और असंतोष महसूस कर रही थीं। इस असंतोष का मुख्य कारण यह था कि वह लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के नेता (Leader of the Parliamentary Party in Lok Sabha) का अहम और ताकतवर पद हासिल करना चाहती थीं। लेकिन पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने उनकी बजाय पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं पर अपना भरोसा जताया। इसके अलावा, हाल ही में जब महत्वपूर्ण संसदीय समितियों का गठन हुआ, तब भी काकोली को वह तरजीह या बड़े पद नहीं मिले जिसकी वे लंबे समय से उम्मीद लगाए बैठी थीं।
रॉय ने एक और बड़ा राज खोलते हुए बताया कि काकोली और उनके बागी गुट के कई सांसद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) और उनकी ‘युवा ब्रिगेड’ के तेजी से बढ़ते प्रभाव से खासे नाराज और असुरक्षित थे। पुरानी पीढ़ी के इन नेताओं को यह महसूस होने लगा था कि पार्टी संगठन में उन्हें लगातार किनारे (Sidelined) किया जा रहा है और महत्वपूर्ण फैसलों में नए और युवा चेहरों को ही आगे बढ़ाया जा रहा है। अपनी इसी पद की लालसा और पार्टी पर घटती पकड़ की हताशा के चलते काकोली घोष दस्तीदार ने अपनी ही पार्टी की पीठ में छुरा घोंपने का फैसला किया। सौगत रॉय ने कड़े शब्दों में कहा, “जब तक आपको पार्टी से सत्ता, पद और टिकट मिलता है, तब तक पार्टी सबसे अच्छी होती है। लेकिन जैसे ही आपकी कुछ व्यक्तिगत इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, आप रातों-रात राष्ट्रहित का झूठा चोला ओढ़कर विरोधियों की गोद में जाकर बैठ जाते हैं।”
बीजेपी का ‘ऑपरेशन लोटस’ और डराने की राजनीति
इस पूरी बातचीत के दौरान सौगत रॉय ने केवल काकोली घोष दस्तीदार पर ही हमला नहीं बोला, बल्कि उन्होंने सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और केंद्र सरकार की मशीनरी को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली में बैठकर बीजेपी के शीर्ष नेता एक सुनियोजित ‘ऑपरेशन लोटस’ (Operation Lotus) चला रहे हैं। रॉय का स्पष्ट कहना है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक तरीके से टीएमसी को हराने में पूरी तरह विफल रहने के बाद, अब ‘बैकडोर’ से सत्ता हासिल करने का खेल शुरू किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय जांच एजेंसियों—जैसे सीबीआई (CBI) और ईडी (ED)—का डर दिखाकर और धनबल का खुला प्रलोभन देकर तृणमूल कांग्रेस के कमजोर सांसदों को तोड़ा गया है।
उन्होंने बताया कि दिल्ली एयरपोर्ट पर ही उन्होंने सुखेन्दु शेखर रॉय और काकोली को संदिग्ध परिस्थितियों में देखा था, जिससे यह अंदेशा और पुख्ता हो गया था कि बीजेपी के रणनीतिकार इस पूरे दलबदल की पटकथा लिख रहे हैं। रॉय ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो नेता केंद्रीय एजेंसियों की जांच के डर से या सत्ता के चंद फायदों के लालच में आज बीजेपी में जा रहे हैं, बंगाल की जागरूक जनता उन्हें आने वाले चुनावों में कभी माफ नहीं करेगी।
टीएमसी का भविष्य और ‘जोड़ा फूल’ पर गहराता संकट
इस अभूतपूर्व बगावत के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय अस्तित्व और उसके प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ (Jora Phool) पर गहरा कानूनी संकट मंडराने लगा है। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कड़ी कार्रवाई और सांसदी जाने के खतरे से बचने के लिए काकोली गुट ने बेहद चालाकी से 20 सांसदों का जादुई आंकड़ा जुटा लिया है। यह संख्या कुल 29 सांसदों के दो-तिहाई (लगभग 66 प्रतिशत) से अधिक है। कानूनी तौर पर इसका सीधा मतलब यह है कि अब यह बागी गुट चुनाव आयोग के सामने खुद को ही असली तृणमूल कांग्रेस होने का ठोस दावा पेश कर सकता है।
अगर चुनाव आयोग इस गुट के बहुमत के पक्ष में फैसला देता है, तो ममता बनर्जी को अपनी ही खून-पसीने से बनाई हुई पार्टी के नाम और निशान से हाथ धोना पड़ सकता है। यह बंगाल की राजनीति में एक युगांतरकारी घटना होगी। फिलहाल, कोलकाता के कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर आपातकालीन बैठकों का दौर लगातार जारी है। ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी के जमीनी संगठन को मजबूत करने, विधायकों को एकजुट रखने और डैमेज कंट्रोल की नई रणनीति पर काम कर रही हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत की राजनीति की सबसे मजबूत ‘स्ट्रीट फाइटर’ नेता इस अभूतपूर्व राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़कर कैसे बाहर निकलती हैं। फिलहाल, सौगत रॉय के इस बेबाक खुलासे ने बंगाल की राजनीति में आरोपों और प्रत्यारोपों की एक नई और तीखी जंग छेड़ दी है, जिसका अंत फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
