नागपुर में नीट (NEET) अभ्यर्थी की दर्दनाक आत्महत्या: सुसाइड नोट में लिखा- “कोई गारंटी नहीं कि मैं दोबारा अच्छा कर पाऊंगा”, परिवार ने परीक्षा रद्द होने को बताया जिम्मेदार
नागपुर में नीट (NEET) अभ्यर्थी की दर्दनाक आत्महत्या: सुसाइड नोट में लिखा- "कोई गारंटी नहीं कि मैं दोबारा अच्छा कर पाऊंगा", परिवार ने परीक्षा रद्द होने को बताया जिम्मेदार
नागपुर, महाराष्ट्र: भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर मानसिक दबाव किस कदर हावी हो चुका है, इसका एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाला मामला महाराष्ट्र के नागपुर शहर से सामने आया है। यहां नीट (NEET – National Eligibility cum Entrance Test) की तैयारी कर रहे एक होनहार छात्र ने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली है। इस घटना ने एक बार फिर देश की शिक्षा प्रणाली, प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस पूरी घटना का सबसे हृदयविदारक पहलू वह सुसाइड नोट है, जो पुलिस को छात्र के शव के पास से मिला है। इस नोट में छात्र ने जो लिखा है, वह हर उस छात्र की पीड़ा को दर्शाता है जो दिन-रात एक करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। दूसरी ओर, मृतक छात्र के बदहवास और गमगीन परिवार ने इस चरम कदम के लिए सीधे तौर पर परीक्षा के रद्द होने और उसके कारण पैदा हुई अनिश्चितता को जिम्मेदार ठहराया है।
सुसाइड नोट का वह दर्दनाक सच: “कोई गारंटी नहीं…” पुलिस सूत्रों के अनुसार, घटना स्थल से बरामद हुए सुसाइड नोट में छात्र ने अपने माता-पिता से माफी मांगी है और अपनी मानसिक स्थिति का मार्मिक वर्णन किया है। सुसाइड नोट में लिखी एक पंक्ति ने पूरे देश का ध्यान खींचा है, जिसमें छात्र ने लिखा है— “मुझे माफ कर दीजिए, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मैं दोबारा परीक्षा में इतना ही अच्छा प्रदर्शन कर पाऊंगा।”
यह एक वाक्य उस गहरे अवसाद (Depression) और खौफ को उजागर करता है, जिससे वह छात्र गुजर रहा था। जब कोई छात्र सालों की कड़ी मेहनत, रातों की नींद और अनगिनत बलिदानों के बाद परीक्षा देता है और उसे लगता है कि उसका पेपर अच्छा गया है, तो वह एक राहत की सांस लेता है। लेकिन जब अचानक किसी पेपर लीक, प्रशासनिक खामी या अन्य कारणों से परीक्षा रद्द कर दी जाती है और दोबारा परीक्षा (Re-exam) देने का फरमान जारी होता है, तो यह उस छात्र के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं होता। सुसाइड नोट से साफ जाहिर होता है कि छात्र दोबारा उस पूरी तनावपूर्ण प्रक्रिया से गुजरने की हिम्मत हार चुका था। उसे डर था कि शायद दूसरी बार वह उतना अच्छा स्कोर न कर पाए, जितना उसने पहली बार में किया था।
परिवार का आरोप: सिस्टम की विफलता ने ली हमारे बच्चे की जान इस মর্মান্তিক (हृदयविदारक) घटना के बाद छात्र के परिवार वालों का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार ने साफ तौर पर कहा है कि उनका बच्चा कमजोर नहीं था, बल्कि सिस्टम की नाकामी ने उसे यह कदम उठाने पर मजबूर किया है।
परिजनों के अनुसार, छात्र ने इस साल की नीट परीक्षा के लिए दिन-रात एक कर दिया था। उसने कोचिंग, मॉक टेस्ट और सेल्फ-स्टडी में अपना सब कुछ झोंक दिया था। परीक्षा देने के बाद वह काफी खुश और संतुष्ट था, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि इस बार उसे एक अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल जाएगा। लेकिन, जैसे ही परीक्षा के रद्द होने और दोबारा आयोजित किए जाने की खबरें सामने आईं, वह गहरे सदमे में चला गया।
परिजनों का कहना है, “हमारे बच्चे ने कोई अपराध नहीं किया था। उसने सिर्फ मेहनत की थी। परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की गलतियों और पेपर लीक जैसी घटनाओं की सजा उन निर्दोष छात्रों को क्यों मिल रही है जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा दी थी? परीक्षा रद्द होने की खबर ने उसका मनोबल पूरी तरह से तोड़ दिया था।”
प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता मानसिक दबाव और सिस्टम की खामियां नागपुर की यह घटना कोई इकलौता मामला नहीं है। कोटा से लेकर देश के विभिन्न कोचिंग हब तक, हर साल दर्जनों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव में अपनी जान दे देते हैं। नीट और जेईई (JEE) जैसी परीक्षाएं छात्रों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुकी हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे की कोचिंग पर लाखों रुपये खर्च करता है, इस उम्मीद में कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनेगा।
लेकिन हाल के वर्षों में, जिस तरह से राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और अन्य संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अनियमितताएं, पेपर लीक और अचानक परीक्षा रद्द होने के मामले सामने आए हैं, उसने छात्रों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। जब एक छात्र को पता चलता है कि उसकी सालों की मेहनत किसी और की गलती (जैसे पेपर लीक करने वाले माफिया) के कारण मिट्टी में मिल गई है, तो उसके भीतर का असंतोष और निराशा चरम पर पहुंच जाती है। दोबारा परीक्षा की तैयारी करना न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी छात्रों को तोड़ देता है।
पुलिस जांच और आगे की कार्रवाई नागपुर पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेज दिया है और मामले की गहन जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने छात्र के कमरे से उसकी किताबें, सुसाइड नोट और मोबाइल फोन जब्त कर लिया है। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या छात्र किसी के सीधे दबाव में था या कोचिंग संस्थान की तरफ से कोई अतिरिक्त प्रेशर था। हालांकि, प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह परीक्षा रद्द होने से उपजे मानसिक तनाव और अवसाद का ही मामला प्रतीत हो रहा है।
निष्कर्ष: हमें कब जागना होगा? एक होनहार छात्र की मौत सिर्फ एक परिवार का नुकसान नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और देश की व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है। सुसाइड नोट के वे शब्द—”कोई गारंटी नहीं कि मैं दोबारा अच्छा कर पाऊंगा”—हमारे नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों के कानों में गूंजने चाहिए।
अब समय आ गया है कि शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव किए जाएं। परीक्षाओं को पारदर्शी, सुरक्षित और छात्र-अनुकूल बनाना होगा। इसके साथ ही, छात्रों की काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि कोई भी परीक्षा जिंदगी से बड़ी नहीं होती, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि सरकारें यह सुनिश्चित करें कि किसी भी छात्र को उसकी मेहनत का फल मिले और सिस्टम की गलतियों की वजह से किसी निर्दोष को मौत को गले न लगाना पड़े।
