शी जिनपिंग और किम जोंग-उन का शिखर सम्मेलन: पूर्वी एशियाई सुरक्षा के लिए एक निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़

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शी जिनपिंग और किम जोंग-उन का शिखर सम्मेलन: पूर्वी एशियाई सुरक्षा के लिए एक निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़

शी जिनपिंग और किम जोंग-उन का शिखर सम्मेलन: पूर्वी एशियाई सुरक्षा के लिए एक निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़

प्योंगयांग: बदलती वैश्विक राजनीति और पूर्वी एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सोमवार (8 जून 2026) को उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग का दौरा किया। सात साल के लंबे अंतराल के बाद शी जिनपिंग की यह उत्तर कोरिया की पहली राजकीय यात्रा है। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन के साथ यह शिखर सम्मेलन क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ (निर्णायक मोड़) माना जा रहा है। ऐसे समय में जब दुनिया दो अलग-अलग ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है, चीन और उत्तर कोरिया के बीच यह कूटनीतिक मुलाकात वैश्विक कूटनीति में गहरे अर्थ रखती है।

कोविड-19 महामारी के बाद से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी विदेश यात्राओं को काफी कम कर दिया है। आज के दौर में जब दुनिया के अधिकांश बड़े नेता उनसे मिलने बीजिंग आते हैं—हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी चीन का दौरा किया था—शी जिनपिंग का प्योंगयांग जाने का फैसला यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि चीन उत्तर कोरिया और अपनी 1,400 किलोमीटर लंबी साझी सीमा पर सुरक्षा के माहौल को कितनी गंभीरता से लेता है।

रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती दोस्ती और चीन की बेचैनी

इस बहुप्रतीक्षित शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि पूरी तरह से रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकियों से प्रभावित है। यूक्रेन युद्ध के बाद से मॉस्को और प्योंगयांग के बीच अभूतपूर्व रक्षा और कूटनीतिक सहयोग देखा गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर कोरिया ने रूस के युद्ध प्रयासों में भारी मदद की है, जिसमें कथित तौर पर हजारों सैनिक, तोपखाने के गोले, पारंपरिक हथियार और बैलिस्टिक मिसाइलों की आपूर्ति शामिल है। इसके बदले में प्योंगयांग को रूस से लगभग 14.4 बिलियन डॉलर का मुआवजा और अत्याधुनिक सैन्य तकनीक मिलने का अनुमान है—एक ऐसी तकनीक जिसका सटीक अंदाजा लगाना पश्चिमी पर्यवेक्षकों के लिए भी मुश्किल है।

हालांकि चीन पारंपरिक रूप से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और ‘आर्थिक जीवनरेखा’ रहा है, लेकिन किम जोंग-उन और पुतिन के बीच गहराते संबंधों को बीजिंग एक शांत बेचैनी के साथ देख रहा है। चीन नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पर उसका ऐतिहासिक प्रभाव कम हो या रूसी सैन्य तकनीक से लैस होकर उत्तर कोरिया कोई ऐसा कदम उठाए जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में अस्थिरता पैदा हो। शी जिनपिंग की यह यात्रा एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य प्योंगयांग में अपना प्रभाव फिर से स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना है कि मॉस्को के साथ बढ़ती दोस्ती चीन के रणनीतिक हितों को नुकसान न पहुंचाए।

परमाणु महत्वाकांक्षाएं और चीन का नरम रुख

शी और किम की बातचीत में उत्तर कोरिया का तेजी से बढ़ता परमाणु शस्त्रागार एक प्रमुख मुद्दा है। हाल के दिनों में किम जोंग-उन ने अपने देश की सैन्य क्षमताओं का खुलकर प्रदर्शन किया है। उन्होंने हाल ही में ‘वेपन्स-ग्रेड’ (हथियार बनाने योग्य) परमाणु सामग्री का उत्पादन करने वाली एक नई फैसिलिटी का दौरा किया था और कसम खाई थी कि वह उत्तर कोरिया के परमाणु शस्त्रागार को “घातीय दर” (exponential rate) से बढ़ाएंगे।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण (denuclearisation) को लेकर चीन ने अपना रुख काफी नरम कर लिया है। अब बीजिंग प्योंगयांग पर परमाणु कार्यक्रम रोकने का सीधा दबाव बनाने के बजाय ‘शांति और स्थिरता’ के सामान्य बयानों तक सीमित रहता है। जानकारों का मानना है कि शी जिनपिंग किम पर इस मुद्दे को लेकर कोई भारी दबाव नहीं डालेंगे, क्योंकि उत्तर कोरियाई नेता अपने परमाणु हथियारों का विस्तार करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध नजर आते हैं। विश्लेषकों के अनुसार, किम इस दौरे का इस्तेमाल खुद को ‘स्थायी परमाणु हथियार वाले देश’ के रूप में मान्यता दिलाने के लिए कर सकते हैं।

आर्थिक सहयोग और संघर्षरत अर्थव्यवस्था

भू-राजनीति से परे, इस शिखर सम्मेलन का किम जोंग-उन के लिए व्यावहारिक और आर्थिक रूप से बहुत बड़ा महत्व है। दशकों के कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और महामारी के दौरान स्वेच्छा से लगाई गई नाकाबंदी ने उत्तर कोरिया की नागरिक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।

उम्मीद है कि किम जोंग-उन इस मुलाकात के दौरान चीन से सीमा पार व्यापार फिर से पूरी तरह शुरू करने, खाद्य सामग्री और उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ाने, और सबसे महत्वपूर्ण, उत्तर कोरिया में चीनी पर्यटन को बढ़ावा देने की मांग करेंगे। किम ने हाल ही में देश में कई नए रिसॉर्ट प्रोजेक्ट विकसित किए हैं, जिन्हें चलाने के लिए उन्हें चीनी पर्यटकों की सख्त जरूरत है। दक्षिण कोरिया और अमेरिका से कूटनीतिक रिश्ते लगभग तोड़ चुके किम दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि बिना कोई रियायत दिए भी उनका देश जीवित रह सकता है और फल-फूल सकता है।

दक्षिण कोरिया के साथ दुश्मनी और 1961 की ऐतिहासिक संधि

यह यात्रा 1961 में चीन और उत्तर कोरिया के बीच हुई ‘मित्रता, सहयोग और पारस्परिक सहायता संधि’ की 65वीं वर्षगांठ के मौके पर हो रही है, जो आज भी चीन की किसी दूसरे देश के साथ एकमात्र औपचारिक रक्षा संधि है।

यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों कोरियाई देशों के बीच तनाव अपने चरम पर है। 2024 के अंत में, किम जोंग-उन ने शांतिपूर्ण एकीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्य को औपचारिक रूप से त्याग दिया था और दक्षिण कोरिया को अपना “कट्टर दुश्मन” (sworn enemy) घोषित कर दिया था। प्योंगयांग ने सियोल के साथ संचार के सभी चैनल बंद कर दिए हैं। इस दुश्मनी की गहराई पिछले महीने तब देखने को मिली जब उत्तर कोरिया की महिला फुटबॉल टीम ने एक टूर्नामेंट के दौरान अपने दक्षिण कोरियाई मेजबानों के प्रति खुलकर विरोध और आक्रामकता दिखाई।

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे मायुंग ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शी जिनपिंग की यात्रा का जिक्र करते हुए कहा, “रूस और उत्तर कोरिया ने लगातार घनिष्ठ संबंध विकसित किए हैं और इसके कारण उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।” सियोल को उम्मीद थी कि शी जिनपिंग शायद प्योंगयांग को बातचीत के रास्ते पर लौटने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, लेकिन मौजूदा हालात में इसकी संभावना न के बराबर है।

अमेरिका की नजर और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन

इस बैठक पर अमेरिका की भी पैनी नजर है। मई में ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीजिंग का दौरा किया था, जहां शी जिनपिंग के साथ कोरियाई प्रायद्वीप के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। अमेरिका लगातार उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों और जापान-दक्षिण कोरिया के साथ अपने बढ़ते सैन्य गठबंधन को लेकर सतर्क है। शी के पहुंचने से ठीक एक दिन पहले किम जोंग-उन ने एक प्रमुख युद्धक सामग्री कंपनी का निरीक्षण किया, जो मिसाइल उत्पादन क्षमताओं का विस्तार कर रही है। यह चीन और अमेरिका दोनों को संदेश है कि प्योंगयांग अपनी सैन्य ताकत से पीछे नहीं हटेगा।

निष्कर्ष: कूटनीतिक जीत का पल

अंततः, तेजी से ध्रुवीकृत होती दुनिया में शी जिनपिंग की प्योंगयांग यात्रा कई रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करती है। बीजिंग के लिए यह पूर्वी एशियाई सुरक्षा वास्तुकला में अपने निर्विवाद प्रभाव की पुष्टि करने और अमेरिका के सामने एक कूटनीतिक चुनौती पेश करने का अवसर है।

दूसरी ओर, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के नेता की मेजबानी करना किम जोंग-उन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत (diplomatic coup) है। यह उनकी उस चतुराई भरी रणनीति को सही साबित करता है जिसमें वह किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय बीजिंग और मॉस्को के साथ अपने संबंधों को संतुलित कर रहे हैं। इस दौरे ने किम जोंग-उन के इस आत्मविश्वास को और बढ़ा दिया है कि वे अपने आर्थिक और सुरक्षा लक्ष्यों को अपनी शर्तों पर हासिल कर सकते हैं।

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