केरल चुनाव परिणाम 2026: फातिमा तहलिया ने रचा इतिहास, मुस्लिम लीग की पहली महिला MLA बन ढहाया लेफ्ट का किला
केरल चुनाव परिणाम 2026: फातिमा तहलिया ने रचा इतिहास, मुस्लिम लीग की पहली महिला MLA बन ढहाया लेफ्ट का किला
कोझिकोड, 5 मई, 2026: केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने न केवल राज्य की सत्ता बदली है, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक और सामाजिक रूढ़ियों को भी तोड़ दिया है। इस चुनाव की सबसे बड़ी ‘जायंट किलर’ बनकर उभरी हैं एडवोकेट फातिमा तहलिया (Fathima Thahiliya)। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की उम्मीदवार फातिमा ने पेराम्ब्रा (Perambra) सीट पर जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। वह मुस्लिम लीग के 75 साल के इतिहास में विधानसभा पहुँचने वाली पहली महिला विधायक बन गई हैं।
पेराम्ब्रा में ‘लेफ्ट’ के अभेद्य दुर्ग में सेंध
पेराम्ब्रा विधानसभा क्षेत्र को दशकों से वामपंथी मोर्चे (LDF) का सुरक्षित गढ़ माना जाता था। यहाँ से एलडीएफ के दिग्गज नेता और मौजूदा संयोजक टी.पी. रामकृष्णन चुनाव मैदान में थे, जिन्होंने 2021 में 22,000 से अधिक मतों से जीत हासिल की थी।
फातिमा तहलिया ने इस कठिन मुकाबले में रामकृष्णन को 5,087 वोटों के अंतर से हराकर सबको चौंका दिया। फातिमा को कुल 81,429 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी रामकृष्णन 76,342 वोटों पर सिमट गए। यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि मुस्लिम लीग के भीतर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के एक नए युग की शुरुआत है।
कौन हैं फातिमा तहलिया? छात्र राजनीति से विधानसभा तक का सफर
फातिमा तहलिया का राजनीति में उदय किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। उनकी पहचान एक प्रखर वक्ता और सुधारवादी नेता के रूप में रही है:
- छात्र राजनीति: फातिमा मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन (MSF) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और इसकी महिला विंग ‘हरिता’ (Haritha) की संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं।
- कानूनी पृष्ठभूमि: पेशे से वकील फातिमा कोझिकोड जिला अदालत में प्रैक्टिस करती हैं। उन्होंने त्रिशूर के सरकारी लॉ कॉलेज से कानून में स्नातकोत्तर (LLM) किया है।
- सामाजिक संघर्ष: उन्होंने हिजाब पहनकर परीक्षा देने के अधिकार के लिए हाई कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। 2017 में उन्हें भारत की सबसे प्रभावशाली छात्र नेताओं में से एक चुना गया था।
- संसदीय अनुभव: 2020 में वे कोझिकोड नगर निगम के कुट्टिचिर वार्ड से पार्षद चुनी गई थीं।
मुस्लिम लीग के लिए ऐतिहासिक मोड़
केरल की राजनीति में मुस्लिम लीग को अक्सर एक रूढ़िवादी पार्टी के रूप में देखा जाता रहा है, जिसने दशकों तक महिलाओं को चुनावी राजनीति से दूर रखा।
- 1996 और 2021 की नाकामी: पार्टी ने इससे पहले केवल दो बार महिलाओं को टिकट दिया था (1996 में कमरुननिसा अनवर और 2021 में नूरबीना राशिद), लेकिन दोनों ही चुनाव हार गईं।
- नई पीढ़ी का नेतृत्व: पार्टी अध्यक्ष सैयद सादिक अली शिहाब थंगल के उदारवादी दृष्टिकोण और फातिमा की जमीनी मेहनत ने इस बार बाधाओं को पार कर लिया।
- युवाओं और महिलाओं का समर्थन: फातिमा ने अपने अभियान में सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्क का बेहतरीन इस्तेमाल किया, जिससे उन्हें युवाओं और खासकर मुस्लिम महिलाओं का भारी समर्थन मिला।
जीत के मायने और चुनौतियां
फातिमा की जीत ने उन आलोचकों को करारा जवाब दिया है जो कहते थे कि मुस्लिम लीग एक महिला को विधानसभा नहीं भेज सकती। अपनी जीत के बाद फातिमा ने कहा:
“यह जीत पेराम्ब्रा के धर्मनिरपेक्ष समाज की जीत है। यह उन सांप्रदायिक प्रचारों के खिलाफ जवाब है जो मेरे खिलाफ किए गए थे। लीग की पहली महिला विधायक के रूप में मेरी जिम्मेदारी अब बहुत बड़ी है।”
चुनाव प्रचार के दौरान वामपंथी नेताओं ने उन्हें ‘जमात-ए-इस्लामी की उम्मीदवार’ बताकर ध्रुवीकरण की कोशिश की थी, लेकिन मतदाताओं ने फातिमा के विकास और जेंडर जस्टिस (लिंग न्याय) के एजेंडे पर मुहर लगाई।
निष्कर्ष: केरल की राजनीति में बदलाव की बयार
फातिमा तहलिया की जीत ने साबित कर दिया है कि केरल का मतदाता अब बदलाव चाहता है। मुस्लिम लीग जैसे पारंपरिक दलों के भीतर महिलाओं का इस तरह उभरना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सुखद संकेत है। पेराम्ब्रा की यह ‘वकील बेटी’ अब केरल विधानसभा में न केवल अपने क्षेत्र की आवाज उठाएगी, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय की हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगी।
