छात्रों पर ‘पुलिस बर्बरता’ को लेकर संसद में घमासान के आसार, धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब अमित शाह विपक्ष के निशाने पर

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छात्रों पर 'पुलिस बर्बरता' को लेकर संसद में घमासान के आसार, धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब अमित शाह विपक्ष के निशाने पर

छात्रों पर 'पुलिस बर्बरता' को लेकर संसद में घमासान के आसार, धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब अमित शाह विपक्ष के निशाने पर

भारत की राजनीति में इन दिनों NEET-UG परीक्षा में हुई कथित अनियमितताओं और पेपर लीक का मुद्दा छाया हुआ है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ऐसा लग रहा था कि शायद सरकार के खिलाफ चल रहा देशव्यापी आक्रोश कुछ शांत हो जाएगा, लेकिन विपक्ष पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है। सोमवार से संसद के मानसून सत्र की कार्यवाही एक बार फिर शुरू हो रही है, और यह तय माना जा रहा है कि संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा होगा। इस बार विपक्ष के निशाने पर शिक्षा मंत्रालय नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए कथित अत्यधिक बल प्रयोग और ‘पुलिस बर्बरता’ को लेकर संसद में तत्काल चर्चा और जवाबदेही की मांग करने जा रहा है।

20 जुलाई का ‘संसद चलो’ मार्च और पुलिसिया कार्रवाई

पूरे विवाद की जड़ 20 जुलाई को छात्रों द्वारा आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च है। NEET-UG परीक्षा में धांधली का आरोप लगाते हुए और व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर हजारों छात्र ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले दिल्ली की सड़कों पर उतरे थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों को जब पुलिस ने संसद की तरफ बढ़ने से रोका, तो हालात बेकाबू हो गए। आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर भारी बल प्रयोग किया।

विपक्ष का दावा है कि प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस दौरान पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) का भी कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया। इस हिंसक झड़प में कई छात्र और सुरक्षाकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं। एक ऐसा आंदोलन जो विशुद्ध रूप से शिक्षा और रोजगार के अधिकारों से जुड़ा था, वह अब पुलिसिया बर्बरता के कारण एक बड़े राजनीतिक और मानवाधिकार के मुद्दे में तब्दील हो गया है।

टीएमसी की मांग: नियम 267 के तहत नोटिस

संसद में सरकार को घेरने की पुख्ता रणनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने सदन के महासचिव को एक नोटिस सौंपा है। घोष ने उच्च सदन के ‘प्रोसीजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस’ के नियम 267 का हवाला देते हुए मांग की है कि दिन के सभी निर्धारित कामकाज को रोककर इस “अत्यंत गंभीर राष्ट्रीय महत्व” के मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जाए।

अपने नोटिस में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है, “शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना हमारे देश में एक संवैधानिक अधिकार है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। फिर भी यह अत्यधिक चिंता और खतरे की बात है कि परीक्षा पत्रों में अनियमितताओं के खिलाफ हाल ही में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्र सुरक्षा एजेंसियों के घातक और अर्ध-घातक (lethal and semi-lethal) बल का शिकार हुए।” यह कदम दिखाता है कि विपक्ष इसे केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के रूप में पेश कर रहा है।

सीपीआई (एम) का कड़ा रुख: अमित शाह के इस्तीफे की मांग

विपक्ष अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही तय करने पर अड़ गया है। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है, इसलिए विपक्ष का तर्क है कि छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की जिम्मेदारी सीधे गृह मंत्री की बनती है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने रविवार को साफ कर दिया कि विपक्ष अमित शाह के इस्तीफे की मांग करेगा। ब्रिटास ने अमित शाह के हालिया बयानों पर तंज कसते हुए पूछा, “अभी कुछ दिन पहले ही शाह ने कहा था कि सरकार उन युवाओं का सम्मान करती है जिन्होंने इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। पिछले 36 दिनों से वह सम्मान कहां था? जब राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर छात्रों को पीटा जा रहा था और उनके सिर फोड़े जा रहे थे, तब वह सम्मान कहां गया?”

उन्होंने आगे कहा, “अगर उन शब्दों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो अमित शाह को भी इस्तीफा देना चाहिए। धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया है। गृह मंत्री, जो मासूम छात्रों पर हुए इस क्रूर हमले के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, उन्हें भी अपना पद छोड़ देना चाहिए।”

राहुल गांधी का पत्र: ‘बर्बर हमले’ और खौफनाक आरोपों का जिक्र

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सरकार पर सीधा हमला बोला है। रविवार को उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को एक विस्तृत पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने छात्रों पर हुए हमले को “बर्बर” करार देते हुए इसकी पूरी जवाबदेही तय करने की मांग की। राहुल गांधी ने अपने पत्र में जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर और विचलित करने वाले हैं।

उन्होंने दावा किया कि पुलिसिया कार्रवाई में सैकड़ों छात्रों को गंभीर चोटें आई हैं। गांधी ने सुरक्षाकर्मियों पर महिला प्रदर्शनकारियों के साथ जानबूझकर मारपीट करने और उनके गुप्त अंगों (private parts) को निशाना बनाने का संगीन आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा, “सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात घातक पैलेट गन का इस्तेमाल है, जिसका उपयोग आमतौर पर आतंकवाद या उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में होता है। मीडिया और सोशल मीडिया पर आ रही रिपोर्टों में साफ देखा जा सकता है कि एक पत्रकार सहित कई लोगों को गंभीर चोटें आई हैं। मैं 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचाब से मिला, जो इस समय भयंकर दर्द में है और एक आंख की रोशनी खोने की कगार पर है क्योंकि उसे पैलेट गन से छर्रे लगे हैं।”

मानसून सत्र का हंगामेदार भविष्य

संसद के मानसून सत्र का पहला हफ्ता लगभग पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गया था। विपक्षी दलों ने सीजेपी (CJP) के नेतृत्व वाले आंदोलन के समर्थन में और नीट (NEET) अनियमितताओं को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन किया था। सरकार ने डैमेज कंट्रोल करते हुए भविष्य में परीक्षा पत्रों के लीक होने से रोकने के लिए कई कड़े कदमों की घोषणा की है, लेकिन इससे विपक्ष शांत होता नहीं दिख रहा है।

अब जब सोमवार को सदन की कार्यवाही फिर से शुरू होगी, तो छात्रों पर पुलिस की इस कथित बर्बरता का मुद्दा दोनों सदनों में छाए रहने की पूरी संभावना है। विपक्ष सरकार को बैकफुट पर धकेलने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता। एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि वह छात्रों के हित में काम कर रही है, वहीं विपक्ष पुलिस की लाठियों और पैलेट गन के घाव दिखाकर सरकार की मंशा और युवाओं के प्रति उसकी संवेदनशीलता पर सवाल उठा रहा है।

यह स्थिति सत्ताधारी दल के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि युवा वर्ग किसी भी चुनाव में एक बहुत बड़ा और निर्णायक वोट बैंक होता है। आने वाले दिन भारतीय राजनीति और संसद के लिए बेहद हंगामेदार साबित होने वाले हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार विपक्ष के इस भारी दबाव के आगे झुकती है, या फिर गृह मंत्री अमित शाह इस सियासी तूफान का अपने चिर-परिचित अंदाज में डटकर सामना करते हैं। एक बात तय है कि NEET का यह मुद्दा अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक सत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

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